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काँच नहीं, अब धार हूँ

पूनम सिंह, प्रसिद्ध लेखिका, मेरठ

कभी किसी दिन
जीवन की इस अनवरत भाग-दौड़ से
कुछ पल चुराकर
मैं अपनी पसंदीदा जगह पर बैठूँगी…

वह जगह होगी
मेरी फूलों से सजी क्यारी,
हरे-भरे, मुस्कराते पेड़
और उसी पेड़ पर
छुपकर बनाया गया
परिंदे का एक छोटा-सा घोंसला…

जहाँ से
नन्हे-नन्हे बच्चों की चहचहाहट उठेगी,
तो लगेगा जैसे
कहीं दूर किसी मंदिर से
घंटियों की मधुर ध्वनि
मेरे कानों तक आ पहुँची हो…

वह स्वर
मेरे हृदय को
शांति और ठंडक से भर देगा।

हाँ…
किसी दिन तो
ज़रूर बैठूँगी मैं वहाँ,
और दूँगी
खुद को ही
खुद की शाबाशी…

अपने ही हाथों से
अपनी पीठ थपथपाऊँगी
और खुद से कहूँगी—

“शाबाश …
तूने विपरीत परिस्थितियों में
जो खुद को साबित किया है,
उसके लिए
तुझे ढेरों शुभकामनाएँ
और ढेर सारा प्यार।”

बेशक…
तू प्रशंसा की हक़दार है।
तू स्वयं के लिए
स्वयं ही मिसाल है।

क्योंकि
टूटकर बिखरी
काँच-सी ज़िंदगी को
तूने
अपने ही हाथों से सँवारा है,
और फिर से
जीने का हौसला जगाया है।

सुनो…
क्या यह कम है?

जानती है न,
यह सब
इतना भी आसान नहीं था…

अपने सपनों को पूरा करने के लिए
तूने जो ज़िद दिखाई है न
किसी और के लिए
न सही,
पर तेरे अपने लिए
तो यह
काबिल-ए-तारीफ़ है।

अब बस ऐसे ही
अपने
मन की देहरी पर
विश्वास का दीपक
जला कर रखना।

ईश्वर तेरे साथ है,
फिर किसी और के
साथ की
क्या आवश्यकता?

खुश रह…
बस खुश रह।

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