युद्ध के बाद ध्वस्त शहर में मलबे के बीच खेलते बच्चे और क्षितिज पर उगती आशा की किरण, जो शांति और मानवता का प्रतीक है।

मैं जानता हूँ, फिर भी…

‘मैं जानता हूँ, फिर भी…’ एक विचारोत्तेजक मुक्तछंद कविता है, जो युद्ध की भयावहता, निर्दोष लोगों की पीड़ा, युद्ध-विराम की राहत और मानवता की अमर जिजीविषा को संवेदनशील शब्दों में अभिव्यक्त करती है। यह कविता विनाश के बीच भी उम्मीद और शांति के महत्व को रेखांकित करती है।

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उफनते सागर के किनारे खड़ा एक चिंतनशील व्यक्ति अपनी परछाई को निहारता हुआ, समय, अस्तित्व और जीवन के बदलते किरदारों पर मनन करता हुआ।

किरदार

हम सभी अपने भीतर कई किरदारों को जीते हैं। कुछ समय के साथ खो जाते हैं, कुछ स्मृतियों में रह जाते हैं, और कुछ जीवन के संघर्षों के बीच नई पहचान गढ़ते हैं। ‘किरदार’ जीवन, समय, जिजीविषा और आत्म-अस्तित्व की उसी अंतर्द्वंद्वपूर्ण यात्रा का काव्यात्मक दस्तावेज़ है।

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भारी बारिश और बाढ़ के बीच नदी किनारे खड़ा एक गरीब ग्रामीण व्यक्ति, दूर झोपड़ी की ओर देखते हुए भावुक और चिंतित मुद्रा में।

जिजीविषा

कोसी नदी के उफान, गरीबी और लाचारी के बीच घिरा मंगरु एक पल के लिए हार मानने को तैयार हो जाता है, लेकिन पत्नी और बेटी का चेहरा उसे फिर जीने की ताकत दे देता है। “जिजीविषा” जीवन से हार न मानने की मार्मिक कथा है।

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काँच नहीं, अब धार हूँ

कभी किसी दिन जीवन की भाग-दौड़ से पल चुराकर मैं अपनी ही बनाई शांति में बैठूँगी। फूलों, पेड़ों और परिंदों की चहचहाहट के बीच मैं खुद को सुनूँगी और तब समझ आएगा कि सबसे बड़ा सहारा मैं स्वयं रही हूँ। टूटकर भी जिसने खुद को समेटा, वही मेरी असली पहचान है।

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जीवन एक संघर्ष है…

जीवन एक संघर्ष है” में जीवन की कठिनाइयों और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बीच संघर्ष की अनिवार्यता को व्यक्त किया गया है। लेखक बताते हैं कि केवल साँस लेना जीवन नहीं है; जीवन का सार संघर्ष, जिजीविषा और प्रकृति के साथ सामंजस्य में है। प्रेम, सौंदर्य, आनंद, विरह और मिलन—सबका संतुलन संघर्ष के माध्यम से ही मिलता है। यह कविता यह संदेश देती है कि अतीत, वर्तमान और भविष्य—सभी में संघर्ष ही जीवन की असली कहानी है। जीत और हार से परे, संघर्ष ही हमें सशक्त बनाता है और जीवन को सार्थक बनाता है।

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