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धारा और संकल्प

कंकड़ और पत्थरों ने मिलकर नदी की दिशा मोड़ने का संकल्प लिया। उन्होंने उसके प्रवाह को रोकने के लिए बाँध बनाए, टीले खड़े किए और पहाड़ बनने का सपना देखा। लेकिन नदी – जो स्वयं प्रवाह की देवी है – न रुकी, न झुकी। वह ठोकरें खाती रही, पर हर बाधा के पार एक नया मार्ग खोजती रही। अपनी गति को कभी न छोड़ते हुए, उसने प्यासों को जल, खेतों को हरियाली और जीवन को उम्मीद दी। अंततः, जब सारे पत्थर थक गए और टीले मिट्टी बन गए, नदी अपनी मंज़िल — समुद्र — तक पहुँच गई। उसने सिद्ध किया कि उसे रोका जा सकता है थोड़ी देर के लिए, पर हमेशा के लिए नहीं। क्योंकि उसका अस्तित्व ही बहते रहने में है।

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हौसले की लौ…

यह कविता आत्मबल, साहस और जीवन संघर्षों के बावजूद आगे बढ़ते रहने की एक सशक्त अभिव्यक्ति है। इसमें कवि अपने जीवन की यात्रा को एक पर्वतारोहण की तरह प्रस्तुत करता है, जहां रास्ता कठिन है, पर मंज़िल की चाह अडिग है।

प्रारंभिक पंक्तियाँ प्रेरणादायक हैं — आँधियों और तूफानों को भी मात देने वाले उस ‘हौसले के दिए’ की बात होती है, जो अंधेरे में भी मार्ग दिखाता है। इसके बाद कविता सपनों की उड़ान की बात करती है, और बताती है कि थकना, रुकना या पीछे हटना विकल्प नहीं है।

यह एक ऐसा जोश भरा गीत है, जो संघर्षों को गीतों में पिरोकर उन्हें प्रेरणा में बदल देता है। वक्त ने चाहे कितनी भी सख्ती दिखाई हो, लेकिन वक्त ही नई रोशनी भी लाएगा — इस उम्मीद को कवि ने ‘नूर’ और ‘दीप’ जैसे प्रतीकों से दर्शाया है।

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कंक्रीट को तोड़कर उगता पीपल का पेड़ और आत्मविश्वास से खड़ी एक मजबूत महिला

जहाँ कुचली जाती है, वहीं उगती है स्त्री

“जिन्हें तोड़ा जाता है, वे पीपल के समान फिर उगते हैं पूरी शिद्दत के साथ।
जहाँ उम्मीदें नहीं होतीं, वहाँ भी हरे-भरे बने रहते हैं।स्त्रियाँ भी ऐसी ही होती हैं जहाँ कुचली जाती हैं,
वहीं अत्यंत सहनशीलता के साथ दोबारा उगती हैं।

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