मिट्टी की खुशबू
छोड़ आये अपना वो गांँव…
“छोड़ आये अपना वो गाँव” में कवि अपने बचपन और गाँव की यादों को भावपूर्ण ढंग से व्यक्त करते हैं। यह कविता गाँव की सरल, प्राकृतिक और आत्मीय जीवन शैली के सुंदर चित्रण से भरी है—बैलगाड़ियाँ, खेतों की हरियाली, पनिहारन की पायल की झनकार, बुजुर्गों की चौपाल और सुबह की ग्रामीण रौनक। शहर की चमक-धमक, गगनचुंबी इमारतें और व्यस्त जीवन के बीच कवि को गाँव की मिट्टी, पेड़ों की छांव और अपनापन याद आता है। कविता यह दर्शाती है कि चाहे जीवन कितनी भी व्यस्त या आधुनिक क्यों न हो, अपने गाँव और सरल जीवन की याद हमेशा हृदय में बनी रहती है, और व्यक्ति को फिर से लौटने की लालसा जगाती है।
गांव में क्या रखा है…
लोग कहते हैं, “गांव में क्या रखा है?”
पर मेरे लिए गांव सिर्फ एक जगह नहीं, मेरे बचपन की थाती है।
वहीं दादी की कहानियां थीं, मां के हाथों से खाया निवाला था, नीम की ठंडी छांव, खेतों की हरियाली और चौपाल की गर्मजोशी थी। कुएं का पानी, पगडंडियों की धूल और पुराने बक्सों में बंद वो मासूम दिन – सब वहीं छूट गए हैं।
गांव की मिट्टी में सिर्फ धूल नहीं, मेरी जड़ें हैं।
जो कहते हैं “गांव में कुछ नहीं रखा,”
शायद उन्होंने कभी गांव को जिया ही नहीं।
