
रीता मिश्रा तिवारी, प्रसिद्ध लेखिका, भागलपुर, बिहार
हे मातृभूमि, जग-जननी माँ,
तेरे सजदे में है सदा सिर नवाँ।।
दुनिया की फिक्र में सुलगा है,
जीवन सदा मेरा तेरे लिए।।
जा न सका कभी, दूर रह न सका,
मैं भूमि से जुड़ा माटी का बंदा।
बुलाती है मुझको मेरी मातृभूमि सदा।।
याद आती है हमको मेरी जमीं,
और घास का वो नर्म बिछौना।।
वो ओस से भींगी जमीन,
सौंधी सी खुशबू मिट्टी की।।
याद आती है हमको
लहलहाती धान की वालियाँ।।
सर्द रातों में अलाव तापते थे जहाँ,
पास बुलाती है अब भी हमको
मेरी प्यारी जमीं, मेरी दिलरुबा।।
बिक गई जमीन सारी कर्ज चुकाने में मेरी,
ना कर्जा चुकाया, ना बुझी आग पेट की भारी।।
मैं ना रहा, रह गई वहीं दीवानगी मेरी,
याद आती है हमको मातृभूमि मेरी।।
