भारतीय सैनिक की वर्दी में खड़ा जवान, पृष्ठभूमि में तिरंगा और भावनात्मक माहौल

सैनिक का अंतर्मन

यह कविता एक सैनिक के अंतर्मन की उन गहराइयों को उजागर करती है, जहाँ कर्तव्य और भावनाएँ एक साथ सांस लेती हैं। वह अपने परिवारपत्नी, बहन, पिता और माँसे दूर होते हुए भी उनसे गहराई से जुड़ा रहता है, लेकिन देश के प्रति अपने वचन को सर्वोपरि रखता है। उसके भीतर का प्रेम त्याग में बदल जाता है, और उसकी हर विदाई एक अनकही पीड़ा के साथ-साथ गर्व का संदेश भी छोड़ जाती है। यह रचना बताती है कि एक सैनिक केवल सरहदों की रक्षा नहीं करता, बल्कि अपने दिल के सबसे करीब रिश्तों को पीछे छोड़कर पूरे देश को अपना परिवार मान लेता है।

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उज्जैन में वंदे मातरम् कार्यक्रम में मंच पर विनय पत्राले और अन्य गणमान्य अतिथियों के साथ भारत भारती और सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के सदस्य

वंदे मातरम् भारत की आत्मा का स्वर है : विनय पत्राले

सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय, उज्जैन में आयोजित कार्यक्रम में श्री विनय पत्राले ने कहा कि वंदे मातरम् केवल गीत नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का स्वर है। कार्यक्रम में सरदार पटेल के योगदान, राष्ट्रगीत और देशभक्ति पर विचार साझा किए गए।

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मातृभूमि प्रेम और ग्रामीण जीवन की यादों को दर्शाती भावपूर्ण हिंदी कविता का प्रतीकात्मक दृश्य

मातृभूमि…

यह कविता मातृभूमि के प्रति गहरे प्रेम और यादों को उजागर करती है। गाँव की मिट्टी, धान की वलियाँ, ओस भरी जमीं और कठिनाइयों के बावजूद मातृभूमि से जुड़ाव को भावपूर्ण तरीके से प्रस्तुत करती है।

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ख़त : सैनिकों के नाम

सीमाओं पर खड़ा सैनिक सिर्फ़ बंदूक नहीं थामे होता, वह अपने घर, अपने बच्चों की हँसी और माता-पिता की आँखों की प्रतीक्षा भी वहीं छोड़ आता है। सर्दी, गर्मी और बरसात उसके लिए मौसम नहीं, कर्तव्य की परीक्षा होते हैं। देश की शान उसके कदमों में और भारत की नींद उसकी आँखों की जाग में सुरक्षित रहती है। यही कारण है कि हर दुआ, हर नमन और हर उम्मीद सबसे पहले उसी के नाम लिखी जाती है।

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हरियाणा का गौरव गान

अंजू शर्मा ‘वशिष्ठ’ करनाल, हरियाणा हरियाणा है वीरों की धरती, शौर्य जहाँ की शान,रक्त में बसा पराक्रम, माथे पर अभिमान।मिट्टी यहाँ की महके वीरों के बलिदान से,हर दिल में गूँजे स्वर भारत माँ के गान से। पंडित लख्मीचंद की रागनी गूँजे, बनकर लोक कथाएं,नेकीराम शर्मा की वाणी, सच्चा पाठ सिखाए ।ऐसे वीरों की धरती ये,…

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हिंदी में हँसी, हिंदी में प्यार

आज हिंदी दिवस पर सबको याद दिलाएँ – अंग्रेज़ी नहीं, अपनी प्यारी हिंदी बोलें! बात करें, हँसी-मज़ाक करें और इसे दिल से अपनाएँ। क्योंकि हिंदी है हमारी भाषा, हमारी पहचान।”

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हिंदी पर बिंदी

हम सभी मिलकर हिंदी को अपना अत्यंत महत्वपूर्ण भाषा बनाना चाहते हैं। केवल अंग्रेज़ी के सहारे हमारा देश नहीं चमक सकता, इसलिए हमें हिंदी को आगे लाना होगा। आज से हम अपने सभी कार्य हिंदी में करेंगे और इसे देश की सर्वश्रेष्ठ पहचान दिलाएंगे। जब हम सभी हिंदी में संवाद करेंगे और अपने काम इसी भाषा में करेंगे, तभी देश का विकास वास्तविक रूप से संभव होगा। यह हमारा दृढ़ संकल्प है कि अंग्रेज़ी को राजभाषा मानने के बजाय हम हिंदी को अपनाएँगे और इसे सभी के बीच फैलाएँगे।

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तिरंगा – हमारा मान

भारत में “तिरंगा” शब्द भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को संदर्भित करता है। हर स्वतंत्र राष्ट्र का अपना ध्वज होता है, जो उसकी स्वतंत्रता का प्रतीक है। भारत के राष्ट्रीय ध्वज को उसके वर्तमान स्वरूप में 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से भारत की स्वतंत्रता से कुछ दिन पहले, 22 जुलाई 1947 को आयोजित संविधान सभा की बैठक के दौरान अपनाया गया था। यह 15 अगस्त 1947 से 26 जनवरी 1950 तक भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में और उसके बाद भारत गणराज्य के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में कार्य करता रहा।

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आजादी का कृष्णपक्ष

आजादी का कृष्णपक्ष**” में कवि स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव की उमंग और उल्लास का चित्रण करते हुए हमें याद दिलाता है कि यह आजादी सहज या मुफ्त में नहीं मिली थी। नीति-कुशलता और योजनाओं के बल पर विदेशी शक्तियों ने भारत में अपने पैर जमाए और “सोने की चिड़िया” के घर में लूटपाट मचाई। फूट डालकर शासन करने की नीति ने धर्मों पर संकट और आपसी विभाजन की आग फैलाई।आजादी के स्वप्न देखने वाले वीरों ने प्राणों की आहुति दी, परंतु उन्हें यह आभास भी नहीं था कि स्वतंत्रता के साथ ही देश को बंटवारे का फरमान मिलेगा। इस उपलब्धि में असंख्य जवानियों की कुर्बानी और बंटवारे में छुपी अनेक अनसुनी कहानियाँ शामिल हैं, जिनमें दुख, करुणा, आतंक और दर्द की गहरी परतें छिपी हैं। विभाजन और विस्थापन के दौरान साथ निभाने वालों ने ही घर-द्वार लूट लिए, मानवता पर पशुता हावी हो गई, हिंसा ने अहिंसा को ढक लिया। कवि आने वाली पीढ़ियों को यह सच्चाई बताने का आग्रह करता है कि भारत नफरत और हिंसा की आड़ में खंडित हुआ।

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