
था इंतज़ार पापा को
अपनी नन्ही परी का,
कितने सपने सँजोए होंगे
पापा ने मेरे जग में आने का।
पर उन्हें क्या पता था,
वे सरहद पर दुश्मनों से लड़ते-लड़ते
दूसरी दुनिया में जाने की तैयारी कर रहे थे,
और मैं इस दुनिया में आने की।
काल द्वारा पोषित वह काली रात
जब पापा को अपने आगोश में ले रही थी,
पापा मानो मुझसे कह रहे थे—
“तुम्हारे धरती पर आने का
समय हो रहा है,
माँ का ख्याल अब तुम्हें ही रखना है।”
जब देहरी पर तिरंगे में लिपटी देह
घर के आँगन में आई थी,
फर्क सिर्फ इतना था कि
मैं कुछ गज कपड़ों में लिपटी थी,
और मेरे पिता तिरंगे में।
मैं पापा की नन्ही परी,
क्या कहूँ अपनी जननी को,
जो शैया पर लेटी हुई
मेरे पापा को आँसुओं से
अंतिम विदाई दे रही थी।
उस दृश्य की कल्पना मात्र से
मेरी आत्मा छलनी हो जाती है।
क्या शिकायत करूँ उस प्रभु से,
जिसने मुझे मेरे पापा का
एक पल का भी प्यार-दुलार नहीं दिया।
हूँ मैं कितनी अभागिन,
अब तो लोग भी कहेंगे,
मुझ पर दोष लगाएंगे कि
मैं माँ का सुहाग खा गई।
यह कलंक भी मुझ पर लगेगा,
सारी ज़िंदगी मेरे साथ चलेगा।
मैं पापा की नन्ही परी,
था इंतज़ार पापा से मिलने का….
