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मैं पापा की नन्ही परी" एक भावुक हिंदी कविता है, जिसमें शहीद सैनिक की बेटी अपने पिता के बिछड़ने का दर्द, माँ की पीड़ा और अपने अनकहे भावों को मार्मिक शब्दों में व्यक्त करती है।

मैं पापा की नन्ही परी

एक शहीद सैनिक की बेटी की दृष्टि से लिखी गई यह हृदयस्पर्शी कविता पिता के बलिदान, माँ के दुःख और एक बेटी के अधूरे स्नेह की कहानी कहती है। “मैं पापा की नन्ही परी” पाठकों की संवेदनाओं को गहराई से छू लेने वाली रचना है।

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पुरानी कलाई घड़ी और उसके साथ रखी पारिवारिक यादें, जो भावनात्मक लगाव और स्मृतियों का प्रतीक हैं।

घड़ी

यह कविता एक साधारण-सी घड़ी से जुड़े गहरे भावनात्मक संबंध को व्यक्त करती है। पिता द्वारा विवाह में उपहार में दी गई घड़ी केवल समय बताने का साधन नहीं, बल्कि प्रेम, दुआओं और स्मृतियों की अमूल्य निशानी बन जाती है। उसके खो जाने के बाद भी उससे जुड़ी यादें मन में जीवित रहती हैं।

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जिसके सिर पर छांव नहीं थी… वो खुद सूरज बन गया”

फादर्स डे पर बच्चों ने मुझे बधाई दी, लेकिन मैं अपने पिता को कभी ‘हैप्पी फादर्स डे’ नहीं कह पाया। क्योंकि वो होते हुए भी कभी पिता जैसे नहीं रहे। ठोकरें लगीं, खुद ही संभला, खुद ही सीखा… शायद इसी में ज़िंदगी की असली सीख थी।”

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