पुरानी यादों की साउंडट्रैक: ऑडियो कैसेट का जादू

मीनाक्षी वर्मा, लेखिका, नईदिल्ली

सन 1990 का दशक मेरी स्मृतियों में आज भी एक धीमी रफ्तार में चलता है। वह समय जब घरों में टीवी और वीसीआर हुआ करते थे और मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन एक छोटी-सी कैसेट होती थी। फ़िल्में देखने के लिए सिनेमाघर ही एकमात्र रास्ता नहीं था। जो लोग टिकट नहीं खरीद सकते थे या भीड़ से बचना चाहते थे, वे किराए पर कैसेट ले आते थे। दस रुपये में पूरी दुनिया घर आ जाती थी। ऋषि कपूर और शाहरुख़ ख़ान की दीवाना हो या संजय दत्त और माधुरी की साजन, फ़िल्म देखी जाती, मन भरता और फिर कैसेट लौटा दी जाती।

हमारी पिछली गली में देबु की छोटी-सी दुकान थी। बाहर से वह अंडा-ब्रेड बेचता था, लेकिन असल पहचान उसकी कैसेटों से थी। नई फ़िल्मों की कैसेटें पाकिस्तान से रिकॉर्ड होकर आती थीं, इसलिए वे खुलेआम नहीं मिलती थीं। उन्हें छुपाकर रखा जाता और उतनी ही सावधानी से किराए पर दिया जाता। उस समय ‘मुर्गा किस्तों पर’ और ‘बकरा किस्तों पर’ जैसे नामों वाली पाकिस्तानी स्टेज प्ले की कैसेटें भी खूब चलती थीं। स्टेज पर होने वाला वह हास्य इतना सहज होता था कि हँसते-हँसते आँखों में पानी आ जाता। कलाकारों के नाम हमें नहीं पता थे, बस इतना जानते थे कि वे हमें हँसा देते थे।

‘लहरें’ नाम की एक कैसेट भी आती थी, जिसमें फ़िल्मी सितारों की ख़बरें दिखाई जाती थीं। उन्हीं दिनों दिव्या भारती की मौत की ख़बरें सुर्खियों में थीं। आत्महत्या थी या हादसा यह सवाल तब भी अनुत्तरित था और आज भी है। लेकिन उस उम्र में ऐसी ख़बरें भी मन पर गहरी छाप छोड़ जाती थीं।

ऑडियो कैसेट का अपना अलग ही जादू था। दुकानों के बाहर दिनभर गाने बजते रहते थे। हर कैसेट की अपनी आवाज़, अपना मिज़ाज होता था। टीवी तब हर घर में नहीं था। हमारी गली में केवल तीन घरों में टीवी था और पड़ोस के बच्चे अक्सर हमारे यहाँ देखने आ जाते थे। एक ही कमरे में बैठकर टीवी देखना, बीच-बीच में आवाज़ें लगाना और फिर अगले दिन उसी पर चर्चा करना यह सब किसी उत्सव से कम नहीं लगता था।

फिर केबल टीवी आया। उस समय यह अफ़वाह आम थी कि एक तार में बीस फ़िल्में आती हैं। असल में केबल वाला ही तय करता था कि क्या चलेगा। दिन में पुरानी फ़िल्में और रात में नई। कभी-कभी ग्यारह बजे के बाद ‘ए’ श्रेणी की फ़िल्में भी चुपचाप चला दी जाती थीं। धीरे-धीरे वीसीआर और कैसेट का चलन कम होने लगा। स्टार प्लस, ज़ी टीवी और सोनी टीवी जैसे चैनलों ने नए-नए सीरियल पेश किए। सीडी प्लेयर भी आया, लेकिन जल्दी ख़राब हो जाने के कारण वह ज़्यादा समय टिक नहीं पाया और कुछ ही वर्षों में बाज़ार से ग़ायब हो गया।

कैसेट का दौर चला गया और फिर लौटकर नहीं आया। आज भी कहीं-कहीं पुराने रेडियो, टीवी, कैसेट प्लेयर और धूल जमी कैसेटें मिल जाती हैं। लेकिन अब गाने और फ़िल्में मोबाइल और पेन ड्राइव में सिमट गई हैं। यूट्यूब और ऐप्स ने सब कुछ आसान बना दिया है. कभी भी, कहीं भी। फिर भी, उस ज़माने में कैसेट लगाकर पूरे परिवार के साथ बैठकर फ़िल्म देखने का जो आनंद था, जो इंतज़ार और अपनापन था, वह आज की तेज़ दुनिया में कहीं खो गया है। तकनीक आगे बढ़ गई है, लेकिन यादों की वह कैसेट आज भी मन के किसी कोने में धीरे-धीरे घूमती रहती है।

4 thoughts on “पुरानी यादों की साउंडट्रैक: ऑडियो कैसेट का जादू

  1. Very nice sara time yaad aa gaya jo bita tha mara kabhi kabhi lagta h vo time vapasa aa jaya but aasa na ho sakta ya yaad bhi bahot achi h jissa kafi kuch feet kar sakta h

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