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बिना स्क्रीन का बचपन

बचपन में आम की गुठलियाँ हमारी खुशियों का साधन थीं। महिदपुर रोड की गलियों में बिखरी गुठलियाँ अंकुरित होकर छोटे पौधे बन जाती थीं। हम उन्हें उखाड़कर घर लाते, पत्थर पर घिसते और फूँक मारकर सुनते “बज रहा है या नहीं।” टूटती गुठली पर डाँट और मार भी सहते, फिर अगले दिन फिर से तलाश में निकल पड़ते। आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, वह सिर्फ़ खेल नहीं था. धैर्य, लगन और छोटे-छोटे प्रयासों की सीख भी थी, जो अब तक दिल में धीरे-धीरे बजती रहती है।

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पुरानी यादों की साउंडट्रैक: ऑडियो कैसेट का जादू

सन 1990 का दशक, जब घरों में टीवी और वीसीआर थे, और मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन कैसेटें थीं। फ़िल्में घर पर किराए पर लेकर देखी जातीं ऋषि कपूर और शाहरुख़ की दीवाना या संजय दत्त और माधुरी की साजन और फिर कैसेट लौटाई जाती। देबु की छोटी दुकान, पाकिस्तानी स्टेज प्ले की हास्य कैसेटें, ऑडियो कैसेट की अपनी आवाज़ और गली में बच्चों का टीवी देखने का मज़ाये सब उस समय की यादों का हिस्सा थे। धीरे-धीरे केबल टीवी और डिजिटल तकनीक ने कैसेट का दौर समाप्त कर दिया, लेकिन उस समय का अपनापन और इंतज़ार आज भी यादों में जीवित है।

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