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जाते हुए साल को सलाम

जाते हुए साल को सलाम कहते हुए दिसंबर धीरे-धीरे विदा लेता है। कुछ रिश्ते साथ रह जाते हैं, कुछ यादों की किताब में दर्ज हो जाते हैं। समय की इस यात्रा में कुछ सपने पूरे होते हैं, कुछ अधूरे रह जाते हैं और उम्र चुपचाप अपने हिस्से का हिसाब घटाती चलती है। बूढ़ा दिसंबर खट्टी-मीठी स्मृतियाँ सौंपकर जाता है, ताकि जनवरी नई उम्मीदों की रोशनी बिखेर सके

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एक पाती मुसाफ़िर के नाम…

जाने से पहले की वह आख़िरी मुलाक़ात जहाँ मौसम, सड़कें, पेड़ और खामोशी तक हमारी बातों के साक्षी बने। मीठी यादों, अनकहे जज़्बातों और एक गलतफ़हमी के बीच खड़ी चुप्पी की दीवार, जो आज भी लौटने से रोकती है।

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यह घर बहुत हसीन है

मेरी ज़िंदगी एक जगह से शुरू नहीं हुई।
वह एक किराए के मकान से दूसरे तक भटकती रही। यह घर सिर्फ़ ईंट और सीमेंट से नहीं बना, इसमें हमारे डर, संघर्ष और सपने बसे हैं। इसीलिए यह साधारण-सा घर मेरे लिए बहुत हसीन है।

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दुविधा का रंग

यह जीवन की वह अवस्था है जहाँ न बचपन की मासूमता पूरी तरह बची है, न बुढ़ापे का सुकून मिला है। जिम्मेदारियों के बीच खड़ा इंसान कभी समाज की अपेक्षाओं को सुनता है, तो कभी अपने दिल की धीमी पुकार को। इसी द्वंद्व में वह खुद को पहचानता है और समझता है कि यही सफ़र जीवन का असली रंग है।

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अधूरे पन्नों का सफ़र

मन अपनी ही दिशा में चल पड़ा अनजान रास्तों पर, आशाओं की छोटी-सी गठरी लिए। पीछे छूटती भीड़ के चेहरों में भावनाओं का तूफान था, पर आगे अभी कई पन्ने लिखे जाने बाकी थे। अल्पविरामों की इस यात्रा में पूर्ण विराम कहीं दूर, किसी नए मोड़ पर इंतज़ार करता दिखा।”

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वक्त की सुइयाँ

घड़ी की तीनों सुइयाँ जीवन के तीन मूल मंत्र सिखाती हैं. छोटी सुई धैर्य देती है, बड़ी सुई दिशा दिखाती है, और सेकंड की सुई हर पल की कीमत समझाती है। ये सुइयाँ रुकती नहीं, चाहे समय कैसा भी हो।हर टिक-टिक मानो याद दिलाती है.वक्त किसी का इंतज़ार नहीं करता, वह बस आगे बढ़ता रहता है।

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मंजिल

अकेलेपन और मार्गदर्शन की खोज का भावपूर्ण वर्णन है। लेखक अपने जीवन में उस पल का अनुभव कर रहा है जब न खुद की दिशा स्पष्ट है, न किसी और का ठिकाना। वह मंजिल और साथी की तलाश में अकेले खड़ा है, उम्मीद करता है कि कोई आए और उसे नए मार्ग की ओर ले जाए। यह एक आत्मान्वेषण और साथी की आवश्यकता की कविता है, जो जीवन में खोए हुए मार्ग और मिलने वाली नई मंजिल की प्रतीक्षा को उजागर करती है।

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विदाई गीत

आज विदाई का वह क्षण है, और मैं यहाँ अकेला खड़ा हूँ, यह सोचते हुए कि क्या कहूँ और शब्दों का सही चयन कैसे करूँ। मेरी आँखें भर आती हैं जब मैं अपने विद्यालय में पहले दिन की यादों को याद करता हूँ—वो उत्साह, वो नर्वसनेस, और दोस्तों के साथ की छोटी-छोटी शरारतें, जैसे क्लास में बंक मारना या किसी का टिफ़िन चुपके से ले जाना। वे निश्चिन्त, हँसी-खुशी भरे पल, दोस्तों के साथ की मस्ती, टीचरों को चिढ़ाना, खेल के मैदान और प्रार्थना की ध्वनि—ये सभी यादें हमेशा मेरे दिल में रहेंगी।

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साथ चलो, बस थोड़ी दूर…

साथ चलो, बस थोड़ी दूर। वक्त को हमसफ़र बनाकर जीवन की इस राह पर कदम बढ़ाते चलो। आज नहीं तो कल, कल नहीं तो रोज़—कभी तो साथ चलना होगा। रास्तों के मोड़ पर, थकान के क्षणों में, जब भी मन डगमगाए, तुम्हारा साथ राह को आसान बना देगा। दूरियों के बहाने छोड़ो, भीड़ और शोरगुल में भी एक पल का साथ बहुत है। टूटे हुए ख्वाबों की चुभन और धोखे की चोट भले ही हो, फिर भी जिगर की गहराइयों में छिपा अपनापन पुकारता है—थोड़ी दूर साथ चलो। रीलों के इस दौर में, जहाँ जिस्म की नुमाइश ने अपनापन छीन लिया है, वहाँ सच्चा साथ ही सबसे बड़ी ताकत है। नींद भले ही आँखों से कोसों दूर हो, मगर जागे पलों की तन्हाई में यही ख्वाहिश मन को बार-बार पुकारती है—थोड़ी दूर साथ चलो।

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