
शैफाली सिन्हा, प्रसिद्ध लेखिका, नवी मुंबई
ये कैसी उम्र में आ गई हूँ मैं,
न बचपन की मासूम शरारतें रहीं,
न ही बुढ़ापे का सुकून अपनाया,
बस ज़िम्मेदारियों की चादर ओढ़े
एक सुविधा में ठहर-सी गई हूँ मैं।
लोग कहते हैं
अब समझदार बनो,
परिपक्वता का रास्ता चुनो,
कंधों पर उम्मीदें टाँगकर
आगे बढ़ो, बिना रुके।
पर दिल धीरे से कहता है
रुको…
अभी ज़रा-सा जी लो,
जो मन चाहे,
उसे महसूस तो कर लो।
कभी आईने में दिख जाती है
वो नटखट-सी बच्ची,
जो आज भी
सपनों के इंद्रधनुष
पकड़ना चाहती है।
तो कभी लगता है—
क्या मैं वही स्त्री हूँ,
जिसकी आँखों में अब
जीवन का अनुभव
ठहर गया है?
शायद यही है ज़िंदगी का असली रंग
न पूरी मासूमियत,
न पूरी परिपक्वता,
बल्कि वो सफ़र
जहाँ इंसान
खुद से सबसे अधिक मिलता है।
न ठहरने की ज़िद,
न भागने की हड़बड़ी,
बस जैसी हूँ,
वैसे ही आगे बढ़ना
सीख रही हूँ मैं।

Jindgi ko samajhne lagi ho
Beautiful
Lesson to daily life
Great understanding of life…nothing in life willever be as expected…full of surprises some good…some bad & some even shocking.
Well expressed..Shefali 💐