दुविधा का रंग
यह जीवन की वह अवस्था है जहाँ न बचपन की मासूमता पूरी तरह बची है, न बुढ़ापे का सुकून मिला है। जिम्मेदारियों के बीच खड़ा इंसान कभी समाज की अपेक्षाओं को सुनता है, तो कभी अपने दिल की धीमी पुकार को। इसी द्वंद्व में वह खुद को पहचानता है और समझता है कि यही सफ़र जीवन का असली रंग है।
