“मन की देहरी: संवेदनाओं का प्रवेशद्वार”

प्रसिद्ध लेखिका पूनम सिंह के काव्य संग्रह मन की देहरी की समीक्षा

समीक्षक-मंजू शर्मा मनस्विनी, प्रसिद्ध लेखिका, भुवनेश्वर

संग्रह की यह प्रथम पंक्ति पाठक के मन को तुरंत बाँध लेती है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे पूरी कृति की आत्मा इसी एक वाक्य में समाई हो। समस्त भावों का माँ को समर्पण, इस काव्य-संग्रह को और भी अधिक पवित्र बना देता है। अपने प्रथम काव्य-संग्रह ‘मन की देहरी’ के प्रकाशन पर पूनम सिंह जी को हृदय से ढेरों शुभकामनाएँ।

लगभग एक वर्ष पूर्व शब्दग्राम पटल से जुड़ने के बाद आदरणीया पूनम सिंह जी के भावनात्मक लेखन से परिचय हुआ। इस संग्रह में संकलित 77 कविताएँ जीवन के विविध अनुभवों से गुजरती हुई पाठक के मन को गहराई तक छूती हैं। उनके शब्द ऐसे प्रतीत होते हैं मानो वे हमारे अपने ही भाव हों बस किसी और ने उन्हें शब्द दे दिए हों।समीक्षा लिखना मुझे हमेशा थोड़ा कठिन लगता है शायद इस आशंका से कि क्या मैं रचनाकार के भाव-जगत के साथ न्याय कर पाऊँगी या नहीं। परंतु एक सजग पाठक होने के नाते यह भी मेरा नैतिक दायित्व है कि पुस्तक रूपी इस सुंदर भेंट पर अपने मन की अभिव्यक्ति दर्ज करूँ।

कविता वह उद्गार है जो हृदय से निकलकर सीधे आत्मा को स्पर्श करती है। पूनम सिंह जी की छंदमुक्त रचनाएँ सहज, सरल और भावप्रवाह से परिपूर्ण हैं। प्रेम, पीड़ा, स्मृति, विरह हर अनुभव लेखिका के मन में उतरकर शब्दों में ढल जाता है।

पुस्तक के आत्मकथ्य में लेखिका लिखती हैं—

“माँ! जीवन तो है
पर छोड़ दिया है
साँसों ने आना-जाना
इंतज़ार करता मन…”

माँ के देहांत के पश्चात बेटी के मन में उतरने वाली रिक्तता इस कविता में सहज ही शब्द बन जाती है। “जब से तुम गई हो, अपाहिज हो गया है घर का कोना” यह पंक्ति केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि घर और जीवन के उजड़ जाने का मार्मिक बिंब है।

स्त्री-मन और उसका प्रेम

स्त्री के प्रेम को लेखिका अत्यंत सूक्ष्मता से रूपांतरित करती हैं-

“कुछ लम्हों का नहीं होता
स्त्री का प्रेम…
बिना देखे, बिना स्पर्श किए
सारी उम्र कर सकती है
वो अपने प्रेमी से प्रेम”

यह प्रेम देह से परे, आत्मा का प्रेम है ईश्वरीय, निष्काम और निःस्वार्थ। ऐसा प्रेम जिसमें पाने की नहीं, केवल देने की आकांक्षा होती है। यह भाव द्वैत से आगे जाकर अद्वैत को स्पर्श करता है।

मन की देहरी -प्रतीक्षा और पीड़ा का रूपक

“कुछ दबी-सी अनकही,
कुंठित-सी अभिलाषाएँ
सारी उम्र आस लगाए बैठी रहती हैं
मन की देहरी पर…”

यहाँ मन की देहरी उन इच्छाओं का प्रतीक बन जाती है जो व्यक्त न हो पाने के कारण भीतर ही भीतर घुटती रहती हैं और अंततः टूट जाती हैं। यह कविता साधारण मनुष्य की अनकही पीड़ा का अत्यंत सशक्त चित्रण है।

संवेदना की सधी अभिव्यक्ति

“बहुत फ़र्क होता है
सब ठीक है होने में
सब ठीक है कहने में…”

ये पंक्तियाँ जीवन का कटु सत्य उजागर करती हैंकथन और यथार्थ के बीच का अंतर, सहने और कहने के बीच का विशाल फासला।

प्रेम, समर्पण और स्त्रीत्व

“प्रेम का पावन गंगाजल बनकर
भर कर करवे में प्रीत-जल
किया मैंने पूर्ण सुहाग पर्व…”

यहाँ प्रेम मात्र रिवाज़ नहीं, एक साधना बनकर उभरता है। समर्पण, आस्था और निःस्वार्थ भाव का ऐसा रूपक विरल ही मिलता है।एहसास बोले, बसंत का आगमन, रिक्त हूँ मैं, तुम याद आए जैसी कविताएँ स्त्री-मन की सूक्ष्म भावनाओं, स्मृतियों और रिक्तताओं को अत्यंत आत्मीयता से उकेरती हैं।

जिज्ञासा प्रकाशन, गाज़ियाबाद द्वारा प्रकाशित यह काव्य-संग्रह निस्संदेह साहित्यप्रेमियों और कविता-पाठकों को विशेष रूप से आकर्षित करेगा।‘मन की देहरी’ संवेदनाओं, स्मृतियों और आत्मिक प्रेम का ऐसा संसार है, जिसमें पाठक अनायास ही प्रवेश कर जाता है। आदरणीया पूनम सिंह जी को इस सुंदर कृति के लिए अनेकानेक बधाइयाँ और साधुवाद।
उनकी लेखनी यूँ ही निरंतर पुष्पित-पल्लवित होती रहे-इसी शुभकामना के साथ।

One thought on ““मन की देहरी: संवेदनाओं का प्रवेशद्वार”

  1. Bahut satik line…..
    बहुत फर्क होता है…. सही होने…और कहने में

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *