मां…

“मॉं” में माँ को जीवन का आधार, हृदय की आवाज़ और आत्मा का सहारा बताया गया है। माँ केवल काया नहीं, बल्कि माया, अनुशासन, संस्कार और ईश्वर की आराधना का प्रतीक हैं। बच्चे की किलकारी, परिवार का बंधन और घर की यादें माँ की खुशी और शक्ति का हिस्सा हैं। कविता यह दर्शाती है कि माँ का अस्तित्व, उनका स्नेह और उनका मार्गदर्शन जीवन की हर परिस्थिति में अनमोल हैं और उनके नाम का पन्ना कभी फटता नहीं।

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माँ का स्वरूप

माँ के दिव्य स्वरूप और मातृत्व, शक्ति, और ममता की अनुभूति का सुंदर चित्रण करती है। इसमें कवि माँ को आकाश सा विशाल हृदय और धरती का धीरज रखने वाली मानते हैं, जो बिना मांगे सब देती हैं और हर समय अपने भक्तों के साथ रहती हैं। कवि माँ से सुख-दुख में साथ रहने, हर सांस में उनका आशीर्वाद पाने और जीवन में उनके दर्शन करने की प्रार्थना करता है। यह कविता भक्ति, श्रद्धा और आत्मीय स्नेह का प्रतीक है, जो माँ की महिमा और उसके संरक्षण की भावना को उजागर करती है।

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मैं कब से थी नीर की बदरी

कविता में एक स्त्री अपनी जीवन-यात्रा को स्मरण करती है। वह बताती है कि बचपन में वह माता-पिता की दुलारी थी—माँ की गुड़िया और पिता की आँखों की पुतली। आँगन और गलियों में सखियों संग खेलते-खेलते उसने प्रेम और रिश्तों को सँजोया।

फिर सपनों से भरे मन के साथ विवाह के बाद विदा हुई, नए रिश्तों की डोर बाँधी। परंतु आगे चलकर उसका जीवन वैसा सुखद नहीं रहा। पवित्र दांपत्य बंधन टूट गया, कई रातें अधूरी रह गईं। उसकी आँखें बरसती रहीं, पर मन का आँगन सूखा पड़ा रहा। इस कविता में बचपन की निश्छलता, विवाह का सपना और फिर विरह तथा विफलता की वेदना—तीनों भाव गहराई से व्यक्त हुए हैं।

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