खुशबू से बंधा पहला प्यार

डॉ दीपाली वार्ष्णेय अग्रवाल
नेचुरोपैथ ,सुजोक थैरेपिस्ट
समाज सेविका ,कवियत्री

मौसम की पहली बारिश में माटी की खुशबू आती है
उसकी मीठी बातों में चाहत की खुशबू आती है

एक दिन उसने गले लगा कर बालों को मेरे सहलाया था
उस दिन से मेरी सांसों में साजन की खुशबू आती है

एक दिन पोथी में लिखकर उसने दिल का हाल बताया था
उस दिनसे मेरे कमरे में किताबों की खुशबू आती है

जब उसके कोमल हाथों में मैंने अपना हाथ थमाया था
उस दिन से मेरे हाथों में महंदी की खुशबू आती है

पहली तनख़्वाह से वो मेरे पायल कंगन लाया था
अब मेरे गहनों से उसके पसीने की खुशबू आती है

उसके कदमो की आहट पर पर्दा बारी से हटाया था
उस दिनसे मेरी खिड़की से रातरानी की खुशबू आती है

एक दिन उसका साया मेरे तन को छूकर गुजरा था
उस दिन से मेरी काया से चंदन की खुशबू आती है

2 thoughts on “खुशबू से बंधा पहला प्यार

  1. दीपालीजी आपकी कविता पढ़ कर मेरे दिल से सानंद की खुशबू आती है। अति सुन्दर

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