
राकेश चन्द्रा
1987 की घटना है। उन दिनों मैं उत्तर प्रदेश के तराई के जनपद पीलीभीत की बीसलपुर तहसील में उपजिलाधिकारी के पद पर तैनात था। वहाँ के दशहरे मेले की चतुर्दिक प्रसिद्धि थी। उस दिन जनपद एवं मंडल से भी अनेक उच्चाधिकारी मेला देखने आया करते थे। यह मेला दशहरा पर्व से कुछ दिन पहले से शुरू हो जाता था। वहाँ के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में अलग-अलग अवसरों के लिए संरचनाएँ की गई थीं। उदाहरण के लिए अशोक वाटिका, रावण का दरबार आदि।
इसी रावण के दरबार में रावण बने कलाकार अपने दरबारियों के साथ बैठकर नृत्य का आनंद लिया करते थे। नृत्य के लिए स्थानीय स्तर पर उपलब्ध नृत्यांगनाओं जिन्हें वहाँ की भाषा में पतुरिया बोला जाता था, बुलाई जाती थीं। यह परंपरा काफी पुराने समय से चली आ रही थी और स्थानीय जनता द्वारा इसका कोई विरोध भी नहीं किया जाता था।
संयोगवश उस वर्ष मेरे समकक्ष पुलिस अधिकारी, पुलिस उपाधीक्षक को यह बात नागवार लगी और उन्होंने मेला समिति के पदाधिकारियों को बुलाकर यह स्पष्ट रूप से कह दिया कि रावण के समक्ष होने वाले पतुरियों के नाच की अनुमति किसी भी कीमत पर नहीं दी जाएगी। रावण इस बात से बहुत दुखी हुए पर उनकी एक न चली। अंततः नृत्य का कार्यक्रम बंद हो गया।
रामलीला का पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम बिना नृत्य के भी चलता रहा। ठीक दशहरे के दिन सायंकाल मैं भी रामलीला मैदान पहुँचा जहाँ पहले से ही काफी भीड़ एकत्रित हो चुकी थी। जनपद मुख्यालय से अधिकारीगण सपरिवार वहाँ पहुँच रहे थे। कुछ समय पश्चात जिलाधिकारी महोदय एवं पुलिस अधीक्षक भी सपरिवार वहाँ आ गए।
रावण वध के कार्यक्रम संपन्न होने के कुछ समय पूर्व मैं व्यवस्थाओं का जायजा लेने रावण के विशालकाय पुतले की तरफ बढ़ ही रहा था कि अचानक मुझे किसी की आवाज़ सुनाई पड़ी। पलट कर देखा तो रावण की भूमिका का निर्वाह करने वाले कलाकार ने मेरी ओर देख कर कहा—”साहब, पानी पहलवान दीजिए। बहुत प्यास लगी है।” मैंने तत्काल अपने साथ चल रहे अधीनस्थ कर्मचारी को पानी उपलब्ध कराने को कहा और बिना किसी विलम्ब के एक ग्लास पानी रावण बने कलाकार के हाथ में पहुँच गया। उसने जल्दी से पूरा पानी गटक लिया। मेरे पूछने पर उन्होंने और पानी लेने से मना कर दिया। इसके बाद मैं आगे बढ़ गया और मेलास्थल का एक चक्कर लगाकर मैं वापस अपने अतिथिगणों के पास पहुँच गया।
अभी रावण वध होने में कुछ ही मिनट बचे थे कि अचानक उसी तरफ से शोर मचने लगा जहाँ रावण बने कलाकार बैठे हुए थे। हम सब उधर दौड़े। वहाँ पहुँच कर देखा तो रावण बने कलाकार को अचेतावस्था में पाया। तुरंत एम्बुलेंस की व्यवस्था की गई और उन्हें लादकर निकटतम सरकारी चिकित्सालय में ले जाने का प्रयास किया गया। पर अत्यधिक भीड़ होने के कारण उन्हें मैदान से वहां पहुँचाने में थोड़ा समय लग गया। वहाँ पहुँचते ही चिकित्सकों ने उनका परीक्षण किया और उन्हें मृत घोषित कर दिया।
सहसा विश्वास ही नहीं हुआ कि जिस व्यक्ति को मैंने कुछ देर पहले पानी पिलवाया था, वह अचानक इतनी जल्दी कैसे प्राण त्याग सकता है! रावण वध उस वर्ष नहीं हो सका और मेला अपने आंचल में त्रासदी समेटे समाप्त हो गया।
मुझे लगा कि रावण को तो हर हाल में मरना ही होता है, चाहे वह पुतला हो या रामलीला में रावण का किरदार निभाता कोई व्यक्ति विशेष!
