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जब आती थी रामलीला..

महिदपुर रोड पर आयोजित रामलीला में हनुमान जी की झांकी सबसे रोमांचकारी थी. केले और फलों से लदे पेड़ों को छलाँग लगाकर तोड़ते, अशोक वाटिका उजाड़ते, और कभी-कभी फल दर्शकों की ओर उछालते। दर्शक इसे श्रद्धा से हनुमान जी का प्रसाद मान लेते थे।

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रामलीला में एक अप्रत्याशित हादसा

यह घटना 1987 की है, जब मैं पीलीभीत के बीसलपुर में उपजिलाधिकारी था। दशहरे मेले में रावण के दरबार में स्थानीय नर्तकियाँ—पतुरिया—नृत्य करती थीं। उस वर्ष पुलिस उपाधीक्षक ने इस नृत्य पर रोक लगा दी। दशहरे के दिन, रावण बने कलाकार ने मुझसे पानी मांगा जिसे मैंने तुरंत दिया। लेकिन कुछ ही देर बाद वही कलाकार अचेत हो गया और चिकित्सालय पहुँचने पर मृत घोषित कर दिया गया। रावण वध उस वर्ष नहीं हो सका और मेला एक त्रासदी में समाप्त हुआ।यह एक याद दिलाती घटना है कि रावण का वध चाहे पुतले से हो या रामलीला में निभाए गए किरदार से, मृत्यु अपरिहार्य होती है।

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रामलीला: एक प्रतीक्षा, एक परंपरा, एक अपनापन

साल 1977 की यह रामलीला सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि महिदपुर रोड की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान थी। रंग-बिरंगे पर्दों, अनुशासनपूर्ण व्यवस्था और जीवंत पात्रों वाली यह रामलीला आज भी स्मृतियों में जीवित है, जब लोग दोपहर में ही रात की सीट बुक करने चले जाते थे, और हनुमानजी का प्रसाद पूंछ से मिलता था।

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