मन का मधुबन
संत पवन के आगमन से मन का मधुबन महक उठा है कलियों की आँखें खुलीं, भंवर गूंजे, तितलियाँ थिरकीं और कोकिला के गीतों से आँगन भर गया। पतझड़ की थकान भूलकर प्रकृति फिर से उत्सव में ढल गई।

संत पवन के आगमन से मन का मधुबन महक उठा है कलियों की आँखें खुलीं, भंवर गूंजे, तितलियाँ थिरकीं और कोकिला के गीतों से आँगन भर गया। पतझड़ की थकान भूलकर प्रकृति फिर से उत्सव में ढल गई।
कविता मानवीय हृदय की उन गहरी इच्छाओं को प्रकट करती है जो भौतिक सुख-संपदा से परे, आत्मिक शांति और सच्चे प्रेम की खोज में हैं। कवि ने “प्रारम्भी नेह” में जीवन को एक ऐसे वन के रूप में देखा है जहाँ वह चंदन जैसी सुगंध और गुलशन जैसी सुंदरता चाहता है, परंतु उसे एहसास है कि धन और वैभव उसके साथ नहीं रहेंगे। इसलिए वह जीवन में सुर-संगम अर्थात् आत्मिक सामंजस्य की चाह रखता है।