एक बेहद संवेदनशील लड़की की आपबीती

सुरेश परिहार,पुणे
कभी-कभी सोचती हूँ कि क्या सच में वो लड़की मैं ही थी. जो बचपन में इतनी हँसती थी, इतनी बातें करती थी, छोटी-छोटी चीज़ों में खुश हो जाती थी. मेरा जन्म एक ऐसे घर में हुआ जहाँ मुझे बहुत प्यार मिला. पापा मुझसे बहुत लगाव रखते थे, लेकिन उनका स्वभाव बेहद सख्त था. उन्हें लगता था कि लड़कियों को ज्यादा खुलापन देना ठीक नहीं. घर से बाहर जाना, किसी से ज्यादा बात करना, खासकर लड़कों से दोस्ती करनाये सब उनके हिसाब से गलत था. उनकी सोच थी कि लड़कियों को ज्यादा पढ़ाने की भी जरूरत नहीं होती. कई बार मैंने उन्हें कहते सुना था कि तीन-चार क्लास तक पढ़ा दो, फिर शादी कर देंगे. लेकिन मेरी माँ बिल्कुल अलग थीं. उन्हें सजना-संवरना पसंद था, जिंदगी को अच्छे से जीना पसंद था, और सबसे ज्यादा वो चाहती थीं कि उनके बच्चे पढ़ें-लिखें, अपने पैरों पर खड़े हों. बेटा हो या बेटी, दोनों कुछ बनेंये उनका सपना था.
शायद उसी वजह से मेरे अंदर भी कुछ सीखने की चाह पैदा हुई. जब मैंने छठी कक्षा पास की थी तभी से मैंने मेहंदी लगाना, पेंटिंग करना, मोतियों से सजावटी सामान बनाना, बंदनवार बनाना सीखना शुरू कर दिया. सिलाई भी सीखी. मुझे हर नई चीज सीखने में बहुत खुशी मिलती थी. लेकिन पापा को ये सब पसंद नहीं था.
उनका कहना था कहीं नहीं जाना है. तब माँ चुपके से मेरा साथ देती थीं. जैसे ही पापा ऑफिस जाते, वो मुझे धीरे से क्लास भेज देतीं. मैं डरते-डरते जाती, सीखती और वापस आ जाती. ऐसा लगता था जैसे मैं कोई बहुत बड़ा अपराध कर रही हूँ, जबकि मैं सिर्फ कुछ सीखना चाहती थी. किसी तरह मैंने बारहवीं पास की.. मेरा हमेशा से मन था कि मैं आगे पढ़ूँ, कुछ बनूँ. क्योंकि बचपन से मैंने औरतों के बारे में बहुत अजीब बातें सुनी थीं. लोग कहते थे औरतें करती ही क्या हैं? सारा दिन आराम करती हैं. ये बातें मुझे अंदर तक चुभती थीं.
मुझे लगता था कि एक दिन मैं कुछ ऐसा करूँगी कि लोग समझेंगे कि औरत सिर्फ रसोई और जिम्मेदारियों के लिए नहीं बनी.लेकिन शायद मेरी किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. बहुत छोटी उम्र में मेरी शादी तय कर दी गई. मुझे ये कहकर लड़का दिखाने ले जाया गया कि सिर्फ देखने जा रहे हैं, पसंद न हो तो मना कर देना.
लेकिन वहाँ जाकर समझ आ गया कि ना बोलने का कोई अधिकार मेरे पास था ही नहीं. मुझे भावनात्मक दबाव दिया गया. कहा गया. अगर तुमने मना किया तो मैं मर जाऊँगा फाँसी लगा लूँगा. उस उम्र में इतनी समझ कहाँ होती है कि कौन-सी बात प्यार है और कौन-सी दबाव. और फिर मेरी शादी हो गई. शादी से पहले मेरा छोटा-सा परिवार थामम्मी, पापा, दो भाई और दादी. लेकिन शादी के बाद मैं एक बहुत बड़े संयुक्त परिवार में आ गई. मेरी सास के नौ भाई-बहन, ससुर के नौ भाई-बहन इतना बड़ा कुनबा कि घर में हर समय कोई न कोई आता-जाता रहता था.
और फिर शुरू हुआ जिम्मेदारियों का अंतहीन सिलसिला. सुबह साढ़े पाँच बजे उठती थी. रात के बारह बजे तक काम खत्म नहीं होता था. खाना बनाना, सफाई करना, रिश्तेदारों की आवभगत करना, हर किसी की जरूरत का ध्यान रखना. मुझे तो शुरुआत में गैस बंद करना तक ठीक से नहीं आता था, लेकिन धीरे-धीरे सब सीखना पड़ा. सीखना भी इसलिए नहीं कि कोई सिखा रहा था, बल्कि इसलिए क्योंकि कोई दूसरा करने वाला नहीं था. शादी के एक साल के अंदर ही मेरा पहला बेटा हो गया. और सच कहूँ, उस समय मैं खुद भी एक बच्ची ही थी. मेरा बेटा बहुत रोता था. उसे गोद से नीचे रखो तो रोता, रातभर नहीं सोता. लेकिन घर के काम रुकते नहीं थे.
मैं एक हाथ में उसे गोद में उठाए रहती और दूसरे हाथ से खाना बनाती. कभी आटा गूँध रही हूँ, कभी सब्ज़ी बना रही हूँ, कभी बर्तन धो रही हूँ और साथ में बच्चा लगातार रो रहा है. रात को वो सोता नहीं था. और दिन में मुझे बैठने तक का समय नहीं मिलता था. कभी-कभी मैं खुद से पूछती थी. क्या यही जिंदगी है?..एक बीस साल की लड़की…जो अभी खुद को समझ भी नहीं पाई थी, वो अचानक एक माँ, बहू और पूरे घर की जिम्मेदार इंसान बना दी गई थी. धीरे-धीरे मुझे महसूस होने लगा कि शादी सिर्फ दो लोगों का रिश्ता नहीं होती, कई बार वह एक लड़की के सपनों का धीरे-धीरे खत्म हो जाना भी बन जाती है.
लेकिन शायद मेरे अंदर कहीं एक छोटी-सी लड़की अब भी जिंदा थी. जो अब भी कुछ सीखना चाहती थी, कुछ बनना चाहती थी, और सबसे ज्यादा खुद को खोना नहीं चाहती थी.
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संवेदनशील कहानी लड़कियां क्या चाहती है उसकी भावनाएं इच्छा को कोई नहीं समझना चाहता। दूसरों की खुशी खातिर अपनी खुशियां और ख्वाहिशों को दफन कर जिंदगी जीती है। बहुत सुंदर 👌
सुरेश जी बेहद हृदय स्पर्शी आलेख है… ऐसा लगता है जैसे किसी के मनोभाव ही हैं… स्त्री की भावनाओं का उसकी मनोदशा का सुंदर चित्रण किया है आपने 🙏
ह्रदय स्पर्शी रचना, बहुत बहुत साधुवाद 🙏🙏😊😊
हमारे समाज की यथार्थवादी, संवेदनशील रचना । आज भी कहाँ समझ पाती है कोई एक लड़की, औरत के मन को । आदमी कहीं जाये तो काम कर रहा औरत जाये तो घुम रही है और न जाने कितने नाम दे दिए जाते हैं ।
मुझे अंत बहुत अच्छा लगा कि वो जीना चाहती थी , सीखना चाहती थी क्योंकि सीखने का कोई उम्र नहीं होता और सबसे बड़ी अपनी पहचान नहीं खोना चाहती । सकारात्मक सोच 👌👌👌
आपसे पूरी तरह सहमत हूं।
हम लोगों का समय ऐसा ही था! बहुत सारा काम, बच्चों का रातभर जागना और उसी बीच अपने शौक को जारी रखना। पढ़कर पुराना समय याद आ गया!
मर्मस्पर्शी आलेख लेखिका मानसिक वेदना को स्पष्ट करते हुए वास्तविकता को परोसा है बेहतरीन 👏👏