वो हँसती थी… अब चुप रहती है
“वो लड़की जो छोटी-छोटी बातों पर हँसती थी, धीरे-धीरे जिम्मेदारियों के बोझ तले चुप होना सीख गई।
यह सिर्फ एक स्त्री की कहानी नहीं, उन अनगिनत लड़कियों की सच्चाई है जो सबकी बनते-बनते खुद को कहीं पीछे छोड़ देती हैं।”

“वो लड़की जो छोटी-छोटी बातों पर हँसती थी, धीरे-धीरे जिम्मेदारियों के बोझ तले चुप होना सीख गई।
यह सिर्फ एक स्त्री की कहानी नहीं, उन अनगिनत लड़कियों की सच्चाई है जो सबकी बनते-बनते खुद को कहीं पीछे छोड़ देती हैं।”
कुछ लड़कियाँ अपने सपने छोड़ती नहीं, बस वक्त और जिम्मेदारियों के नीचे छिपा देती हैं। यह कहानी एक ऐसी ही लड़की की है, जिसने परिस्थितियों से समझौता किया, लेकिन अपने भीतर की पहचान को कभी मरने नहीं दिया।
श्मशान की राख से लौटकर जब ज़िंदगी की जिम्मेदारियाँ बाँहों में भर ली जाती हैं—तब यह कविता मृत्यु से आँख मिलाकर जीवन को चुनने का साहस बन जाती है।