
डॉ.मीना मुक्ति, प्रसिद्ध लेखिका, लातूर (महाराष्ट्र)
तुषार और मीरा की शादी के पन्द्रह साल किसी युद्ध के मैदान से कम नहीं थे। पढ़ा-लिखा तुषार शिक्षक होने के बावजूद जहाँ पुरानी रूढ़ियों की जकड़ में था, वहीं मीरा खुले आसमान में विश्वास रखती थी। जब उनके घर मुक्ति का जन्म हुआ, तो तुषार के चेहरे पर खुशी की जगह मायूसी छा गई। उसके लिए वंश का अर्थ केवल ‘बेटा’ था।
मुक्ति जब पाँच साल की हुई, तो तुषार ने दो टूक शब्दों में कह दिया,
“इसे पास की गली वाले स्कूल में डाल दो। अंग्रेजी स्कूल की फीस मैं नहीं भर सकता। आखिर लड़की ही तो है, ज़्यादा पढ़ाकर क्या करना है? मुझे तो बेटा चाहिए था, जो मेरा नाम बढ़ाता।”
मीरा समझ गई थी कि पैसों की कमी नहीं, इच्छा की कमी थी, जो अपनी ही बेटी को पढ़ाने के लिए तुषार ने ऐसा कहा था। मीरा की आँखों में चमक और स्वर में दृढ़ता थी। उसने कहा,
“नाम केवल बेटा नहीं, काबिलियत बढ़ाती है तुषार। अगर तुम मुक्ति की पढ़ाई की ज़िम्मेदारी नहीं लोगे, तो मैं स्वयं लूँगी।”
मीरा ने नौकरी शुरू की। दिन भर स्कूल में काम और शाम को मुक्ति की पढ़ाई। तुषार अक्सर ताने देता,
“पर निकल आए हैं तुम्हारे, पर याद रखना, किसी दिन ये पर काट दूँगा मैं… और तब गिरोगी तो मेरे ही पैरों में… बड़ी आई पैसा कमाकर पढ़ाने वाली… पति की सेवा में ध्यान नहीं लगता तुम्हारा आजकल… लोग क्या कहेंगे।”
मीरा चुपचाप सहती रही, क्योंकि उसका लक्ष्य मुक्ति का भविष्य था।
वक्त बीतता गया, तुषार की कड़वाहट बढ़ती गई। मुक्ति की नौवीं की परीक्षा खत्म ही हुई थी कि एक रात तुषार ने रोजमर्रा की तरह बेवजह झगड़ा शुरू किया और अचानक मीरा पर हाथ उठा दिया।
“सब तुम्हारी वजह से हुआ! तुमने मुझे वारिस नहीं दिया,” तुषार लगभग चिल्लाया।
मीरा ने गिरते हुए खुद को संभाला, मासूम बच्ची की सहमी हुई आँखों में देखा और उसी पल फैसला कर लिया। उसने मुक्ति का हाथ पकड़ा और दरवाजे की ओर बढ़ गई।
तुषार ने दम भरते हुए कहा,
“कहाँ जा रही हो? इस समाज में अकेले एक औरत की क्या औकात है?”
मीरा ने केवल आँखों का कटाक्ष डाला और मन ही मन कहा,
“वही औकात बनाने जा रही हूँ, जो तुमने आज तक नहीं समझी। अब इस घर में न मैं रहूँगी, न मेरी बेटी का स्वाभिमान।”
मीरा बेटी को लेकर एक नए शहर आ गई। छोटा सा कमरा, सीमित साधन, पर मन में असीम शांति थी। अब वह उन तमाम कमरतोड़ जिम्मेदारियों और तानों से दूर आ चुकी थी। स्कूल में पढ़ाने के बाद घर पर बेटी को पढ़ाती, और जब भी समय मिलता, वह लेखन में रम जाती।
मुक्ति ने अपनी माँ के पसीने की एक-एक बूंद की कीमत समझी। अपनी बुद्धिमत्ता और कड़ी मेहनत के दम पर उसने नीट की परीक्षा में रैंक हासिल कर एमबीबीएस में दाखिला लिया।
जब समाज को पता चला कि मीरा ने अकेले दम पर बेटी को डॉक्टर बनाया है, तो वही लोग, जो पहले कानाफूसी करते थे, अब मिसालें देने लगे।
एक दिन तुषार उनके नए घर के दरवाजे पर खड़ा था। वह शांत और अकेला दिख रहा था। उसका चेहरा देखकर लग रहा था कि समाज के सारे ताने अब उसके हिस्से आ गए थे। उसने पश्चाताप भरे स्वर में कहा,
“मीरा, मुझे माफ कर दो। मुझे समझ आ गया कि वंश बेटा नहीं, संस्कार और शिक्षा बढ़ाते हैं। चलो वापस घर चलते हैं।”
मीरा ने शांति से उसे देखा और कहा,
“तुषार, वह मीरा मर चुकी है, जो तुम्हारे साये में खुद को ढूंढती थी। अब मैं स्वतंत्र हूँ। न मुझे तुम्हारी नफरत से फर्क पड़ता है, न तुम्हारी इस याचना से। मेरी दुनिया अब मेरी कविताओं और मेरी बेटी मुक्ति की सफलता में है।”
मीरा ने दरवाजा बंद कर दिया। उसने तुषार को नहीं, बल्कि अपनी बेड़ियों को हमेशा के लिए पीछे छोड़ दिया था।

ये शौर्य ये हिम्मत हर मीरा मे नही होती. मीरा बस विष का प्याला अमृत समझ कर पिती आयी है
प्रेरणादायी कहानी 🌹🌹
बहुत मर्मस्पर्शी प्रेरणादायी कहानी l हार्दिक बधाई और शुभ कामनाएँ मुक्ति जी 💥 ♥️ …