सभाकक्ष में लकड़ी की मेज, कुर्सियां और बाहर खड़ा अकेला पेड़ – पर्यावरण पर आधारित हिंदी कविता 'लकड़ी का सम्मेलन' का प्रतीकात्मक दृश्य।

लकड़ी का सम्मेलन

लकड़ी का सम्मेलन’ एक सशक्त समकालीन हिंदी कविता है, जिसमें सभ्यता, पर्यावरण और मनुष्य के पाखंड पर तीखा व्यंग्य किया गया है। कविता बताती है कि पेड़ों की रक्षा के भाषण अक्सर उन्हीं लकड़ियों के बीच दिए जाते हैं, जिनकी देह कभी जंगल हुआ करती थी।

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सूखी नदी, कूड़े के पहाड़ और प्लास्टिक से ढके शहर को देखते हुए एक लेखिका डायरी में लिखती हुई, पर्यावरणीय चिंता और संवेदनशीलता को दर्शाता दृश्य।

मैं लिखूँ

जब प्रकृति घायल हो, नदियाँ सूख जाएँ, शहर प्लास्टिक से ढक जाएँ और चारों ओर पर्यावरणीय संकट दिखाई दे, तब संवेदनशील मन चुप नहीं रह पाता। ‘मैं लिखूँ’ कविता उसी बेचैनी, जिम्मेदारी और परिवर्तन की उम्मीद का सशक्त स्वर है।

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मिट्टी के पात्र में रखा पानी पीती हुई प्यास से व्याकुल छोटी चिड़िया

चिड़िया प्यासी है…

यह कविता “चिड़िया प्यासी है” जल संरक्षण और जीवदया का मार्मिक संदेश देती है। बदलते पर्यावरण और घटती चिड़ियों की संख्या के बीच यह रचना हमें याद दिलाती है कि पक्षियों के लिए पानी रखना भी एक बड़ी सेवा है।

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मछलियाँ हिंदी कविता पर्यावरण और जल संरक्षण

मछलियाँ…

इन आँखों में बसे असंख्य समंदर कभी हँसी बनकर छलकते हैं, तो कभी अचानक आँसुओं में बदल जाते हैं। जाल से डरती मछलियाँ अतल गहराइयों में खो जाती हैं, जहाँ बिछुड़ने का दुख भी उनके हिस्से आता है। बाज़ार की साज़िशों में उलझा शिकारी सिर्फ़ पकड़ने की भाषा समझता है उसे न जिजीविषा दिखती है, न जीवन की पीड़ा। रंग-बिरंगी मछलियाँ कुछ दिनों का मनोरंजन बनती हैं और फिर गंदे पानी में तड़पकर समर्पित हो जाती हैं। स्वच्छ पानी की अनदेखी में दम तोड़ती मछलियाँ याद दिलाती हैं कि जीवन तभी बचेगा, जब संवेदना बचेगी।

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