प्रकृति का कहर
प्रकृति जब विकराल रूप धारण करती है तो इंसान ही नहीं, पशु-पक्षी और जीव-जंतु भी संकट में पड़ जाते हैं. यह कविता प्रकृति के साथ किए जा रहे खिलवाड़ और पर्यावरण संतुलन की आवश्यकता पर सवाल उठाती है.

प्रकृति जब विकराल रूप धारण करती है तो इंसान ही नहीं, पशु-पक्षी और जीव-जंतु भी संकट में पड़ जाते हैं. यह कविता प्रकृति के साथ किए जा रहे खिलवाड़ और पर्यावरण संतुलन की आवश्यकता पर सवाल उठाती है.
बरगद केवल एक विशाल वृक्ष नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में आश्रय, ज्ञान, एकता और संस्कार का प्रतीक है। ‘बरगद की छाँव’ कविता इसी वृक्ष के महत्व और बुजुर्गों की छाया को खूबसूरती से जोड़ती है।
लकड़ी का सम्मेलन’ एक सशक्त समकालीन हिंदी कविता है, जिसमें सभ्यता, पर्यावरण और मनुष्य के पाखंड पर तीखा व्यंग्य किया गया है। कविता बताती है कि पेड़ों की रक्षा के भाषण अक्सर उन्हीं लकड़ियों के बीच दिए जाते हैं, जिनकी देह कभी जंगल हुआ करती थी।
यह कविता “चिड़िया प्यासी है” जल संरक्षण और जीवदया का मार्मिक संदेश देती है। बदलते पर्यावरण और घटती चिड़ियों की संख्या के बीच यह रचना हमें याद दिलाती है कि पक्षियों के लिए पानी रखना भी एक बड़ी सेवा है।
इन आँखों में बसे असंख्य समंदर कभी हँसी बनकर छलकते हैं, तो कभी अचानक आँसुओं में बदल जाते हैं। जाल से डरती मछलियाँ अतल गहराइयों में खो जाती हैं, जहाँ बिछुड़ने का दुख भी उनके हिस्से आता है। बाज़ार की साज़िशों में उलझा शिकारी सिर्फ़ पकड़ने की भाषा समझता है उसे न जिजीविषा दिखती है, न जीवन की पीड़ा। रंग-बिरंगी मछलियाँ कुछ दिनों का मनोरंजन बनती हैं और फिर गंदे पानी में तड़पकर समर्पित हो जाती हैं। स्वच्छ पानी की अनदेखी में दम तोड़ती मछलियाँ याद दिलाती हैं कि जीवन तभी बचेगा, जब संवेदना बचेगी।