
रत्ना भदौरिया रायबरेली (उत्तर प्रदेश)
सभाकक्ष में
सागौन की देह पर
धूप नहीं, वार्निश चमक रही थी।
कुर्सियों की पीठ पर
जंगल की रीढ़ टिकी थी,
और सोफ़ों की मुलायम चुप्पी में
कई घोंसलों की टूटी नींद दबी थी।
मेज़ के रेशों में
वृक्ष-वर्षों के वृत्त नहीं,
समय के कटे हुए कंठ थे।
खिड़की के बाहर
एक अकेला पेड़
हवा को ऐसे पढ़ रहा था,
जैसे मृत्यु से पहले
कोई अपनी अंतिम चिट्ठी पढ़ता है।
भीतर घोषणा हुई—
“पेड़ों की कटाई पर रोक लगे।”
तभी
लकड़ी ने अपनी गंध से पूछा—
“क्या मेरी देह
तुम्हारे शब्दों से छोटी है?”
तालियाँ बजीं,
पर वे मुझे
सूखे पत्तों की नहीं,
कुल्हाड़ियों की प्रतिध्वनि लगीं।
उस क्षण
पूरा सभाकक्ष
जंगल की राख से बना
एक विराट आईना था,
जिसमें
मनुष्य का चेहरा नहीं,
एक चलता हुआ आरा
अपना ही भाषण सुन रहा था।
लेखिका के बारे में-
रत्ना भदौरिया
उत्तर प्रदेश के रायबरेली की प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं। पेशे से नर्स होने के बावजूद उन्होंने सेवा और संवेदना को शब्दों की ऐसी ऊष्मा दी है, जिसने उन्हें हिंदी साहित्य में विशिष्ट पहचान दिलाई है। मानव जीवन के विविध अनुभव, रिश्तों की जटिलता, स्त्री चेतना और समाज की अनकही सच्चाइयाँ उनकी रचनाओं का मूल स्वर हैं। उनके लेखन में जीवन की पीड़ा भी है, करुणा भी, संघर्ष भी और आशा का उजास भी।
भारत स्काउट एवं गाइड द्वारा राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित रत्ना भदौरिया ने कथा, लघुकथा, संस्मरण, कविता, आलेख और संपादन—सभी विधाओं में उल्लेखनीय योगदान दिया है। उनका चर्चित कहानी-संग्रह ‘सामने वाली कुर्सी’, संस्मरण ‘मेरे जीवन की धुरी : मन्नू भंडारी’ तथा संपादित कृतियाँ ‘धरोहर’, ‘स्त्री प्रतिनिधि कहानियाँ’ और ‘अधूरी नींद का सपना’ उनकी साहित्यिक दृष्टि और संपादकीय कौशल का सशक्त प्रमाण हैं। उनकी रचनाएँ देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं—हंस, कथादेश तथा अनेक अन्य पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। वे साहित्यिक पत्रिका ‘पूर्वकथन’ की समन्वय संपादक के रूप में भी सक्रिय हैं और नई रचनाशील प्रतिभाओं को मंच प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।रत्ना भदौरिया का लेखन केवल शब्दों का संसार नहीं, बल्कि मनुष्य की आत्मा से संवाद है। उनकी रचनाएँ पाठकों को संवेदना, आत्ममंथन और जीवन के गहरे मानवीय सरोकारों से जोड़ती हैं। यही उनकी लेखनी की सबसे बड़ी शक्ति और उनकी साहित्यिक पहचान है।
