सुबह की धूप में आँगन, तुलसी पर चमकती ओस, मुंडेर पर बैठे कबूतर और शांत घरेलू वातावरण का काव्यात्मक दृश्य।

जीवन-सौंदर्य

आले में रखी नीली शीशी, हवा से हिलता अख़बार, तुलसी पर ठहरी ओस, बारिश की स्मृतियाँ और समय का अविराम प्रवाह यह कविता बताती है कि जीवन का वास्तविक सौंदर्य बड़े क्षणों में नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की साधारण दिखने वाली अनुभूतियों में छिपा होता है।

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सभाकक्ष में लकड़ी की मेज, कुर्सियां और बाहर खड़ा अकेला पेड़ – पर्यावरण पर आधारित हिंदी कविता 'लकड़ी का सम्मेलन' का प्रतीकात्मक दृश्य।

लकड़ी का सम्मेलन

लकड़ी का सम्मेलन’ एक सशक्त समकालीन हिंदी कविता है, जिसमें सभ्यता, पर्यावरण और मनुष्य के पाखंड पर तीखा व्यंग्य किया गया है। कविता बताती है कि पेड़ों की रक्षा के भाषण अक्सर उन्हीं लकड़ियों के बीच दिए जाते हैं, जिनकी देह कभी जंगल हुआ करती थी।

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मछलियाँ हिंदी कविता पर्यावरण और जल संरक्षण

मछलियाँ…

इन आँखों में बसे असंख्य समंदर कभी हँसी बनकर छलकते हैं, तो कभी अचानक आँसुओं में बदल जाते हैं। जाल से डरती मछलियाँ अतल गहराइयों में खो जाती हैं, जहाँ बिछुड़ने का दुख भी उनके हिस्से आता है। बाज़ार की साज़िशों में उलझा शिकारी सिर्फ़ पकड़ने की भाषा समझता है उसे न जिजीविषा दिखती है, न जीवन की पीड़ा। रंग-बिरंगी मछलियाँ कुछ दिनों का मनोरंजन बनती हैं और फिर गंदे पानी में तड़पकर समर्पित हो जाती हैं। स्वच्छ पानी की अनदेखी में दम तोड़ती मछलियाँ याद दिलाती हैं कि जीवन तभी बचेगा, जब संवेदना बचेगी।

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