
अपूर्वा
मुझे अच्छी लगती है
आले में रखी
नारियल तेल की
नीली शीशी।
मुझे प्रिय लगता है
सुव्यवस्थित तहों में
सोया हुआ अख़बार,
जो हवा से
क्षण-क्षण स्पंदित होकर
अपनी निस्तब्धता में भी
फड़फड़ाता रहता है।
मुझे अच्छा लगता है
आँगन की दीवारों पर
सूर्य-किरणों का
अनुपम नर्तन,
जो हर शाम
नया प्रकाश और नई छाया
रचता है।
मुझे अच्छे लगते हैं
मुंडेर पर विराजमान कबूतर,
उनका अल्पविराम,
और फिर
असीम आकाश की ओर
उनका प्रस्थान।
मुझे अच्छी लगती है
तुलसी-पत्रों पर ठहरी
ओस की पारदर्शी बूँद,
जो सूरज की रोशनी से
अनगिनत दीपों-सी
झिलमिला उठती है।
मुझे
अच्छी लगती है बारिश,
जो स्मृतियों के
अनाम द्वार खोल जाती है।
और सबसे अधिक
मुझे अच्छा लगता है
समय को
अविराम प्रवाहित होते देखना,
उसकी धारा में
स्वयं को
धीरे-धीरे व्यय होते अनुभव करना।
सच,
जीवन का वास्तविक सौंदर्य
कभी क्षणों को
संचित करने में था ही नहीं।

बहुत बहुत 👌👌👌
वाह बहुत सुन्दर….मुझे अच्छी लगती है
आले में रखी
नारियल तेल की
नीली शीशी।