गुलमोहर और रजनीगंधा
क्या प्रेम केवल साथ रहने का नाम है, या किसी की खुशबू की तरह मन में हमेशा बने रहने का एहसास? ‘गुलमोहर और रजनीगंधा के नाम’ एक रूहानी और रोमांटिक पत्र है, जो प्रेम को रंगों, खुशबू और आत्मिक जुड़ाव के माध्यम से व्यक्त करता है।

क्या प्रेम केवल साथ रहने का नाम है, या किसी की खुशबू की तरह मन में हमेशा बने रहने का एहसास? ‘गुलमोहर और रजनीगंधा के नाम’ एक रूहानी और रोमांटिक पत्र है, जो प्रेम को रंगों, खुशबू और आत्मिक जुड़ाव के माध्यम से व्यक्त करता है।
जिंदगी एक ऐसा अनुभव है जो कभी भ्रम बनकर सामने आती है, तो कभी ख्वाब की तरह आंखों में उतर जाती है. यह हँसी और आँसू के बीच झूलती हुई एक अनकही बेचैनी है, जिसे इंसान जीवन भर सुलझाने की कोशिश करता रहता है. कभी अधूरी रह जाती है, तो कभी मुकम्मल होकर भी सवाल छोड़ जाती है.
वह ख्यालों में बार-बार आता रहा कभी याद बनकर सुलाता, कभी कसक बनकर रुलाता। कभी ज़ख़्मों पर मरहम था, तो कभी दिल की आग। साँसों में उसकी महक थी, बारिश की तरह वह बरसता रहा। जब दिल के दरवाज़े खुले, तो वही धड़कन बनकर बस गया। समय बेरहम था, इश्क़ पर परदा रहा और मैं, हर टूटन के बाद भी उसी को महसूस करती रही।
मैं सोचती हूं कि क्यों इन दिनों हर पल तुम्हारा ही ख़याल आता है। दिल करता है कि कुछ ऐसा बन जाऊं जिससे तुम्हारे आस-पास रह सकूं हमेशा — कभी वो कागज़ जिस पर तुम दिल की बातें लिखते हो, कभी तुम्हारी कलम, तुम्हारी ऐनक, या बस कोई ख़याल जिसमें तुम डूबे रहते हो। लेकिन सबसे ज़्यादा दिल चाहता है कि मैं वो अश्क बन जाऊं — जो तुम्हारी आंखों में ठहरा होता है, जिसे तुम दुनिया से छुपाकर रखते हो, गिरने नहीं देते किसी के सामने। वही अश्क, जो तुम्हारे सबसे पास होता है और फिर भी नज़र नहीं आता। ख़्वाहिश बस इतनी है… कहो, क्या इजाज़त है?