कागज़ की कश्ती

कविता बचपन की उन मीठी यादों को जीवंत करती है जब बारिश में “कागज़ की कश्ती” सपनों का प्रतीक बन जाती थी। न चिंता थी, न भय—बस मासूमियत और आनंद था। अब वक्त बदल गया है; बारिश, दोस्त और वो बचपन सब पीछे छूट गए हैं। “कागज़ की कश्ती” आज सिर्फ उन सुनहरे दिनों की प्यारी याद बनकर रह गई है।

Read More

ख़्वाहिशों के न फिर महल होंगे

मधु झुनझुनवाला ‘अमृता‘ प्रसिद्ध साहित्यकार, जयपुर (राजस्थान) मुंतज़िर थे हमीं न कल होंगे ।ये लम्हे क्या कभी अज़ल होंगे । फ़िक्र अब है कहाँ मुहब्बत में,ज़ीस्त में क्यों सनम दख़ल होंगे । दिल बुझेंगे कभी जो फुर्कत में,ख़्वाहिशों के न फिर महल होंगे । बाद मेरे इन्हीं निगाहों में ,अश्क़ में तर हसीं कँवल होंगे…

Read More

दो सितारों का मिलन…42 साल बाद

बयालीस साल बाद हुई यह मुलाकात सिर्फ दो पुराने साथियों के मिलने भर की नहीं थी, बल्कि उन दिनों की धड़कनों को फिर से जी लेने जैसा अनुभव थी। इंदौर की गलियों में साइकिल से खबरों की तलाश में दौड़ते हुए बिताए गए वे दिन यादों की परतों से झाँकने लगे — अनंत चतुर्दशी की रातें, दंगों के बीच रिपोर्टिंग की बेचैनी, और श्मशानघाटों से जुटाई गई खबरों की जिम्मेदारी।

रतलाम के घर में बैठे हुए, चाय की प्यालियों के बीच समय जैसे ठहर गया था। हम दोनों बीच-बीच में ठहाके लगाते, कभी पुराने नामों को याद करते और कभी आज की पत्रकारिता पर अफसोस जताते। प्रदीप जब अपनी खबरों के डिजिटलाईजेशन की बात कर रहे थे, तो मन में एक अजीब कसक उठी — कुछ चीज़ें वक्त के साथ सँभाल लेनी चाहिए थीं।

Read More

संदूक भर जीवन

घर के पिछले कमरे में रखा वह पुराना संदूक अब एक वस्तु नहीं रहा, वह मानो माँ के जीवन की पूरी कथा समेटे बैठा है। उसमें मायके की यादें हैं, विवाह की रस्मों के निशान हैं, और मातृत्व के पहले क्षणों की सोंधी गंध अब भी बसी है। हर वस्तु, हर दस्तावेज़ किसी बीते समय की गवाही देता है — मनीऑर्डर का पन्ना, साइकिल की रसीद, गाँव का ढहता इतिहास।
माँ के झुर्रियों वाले हाथ जब उसे छूते हैं, तो उनमें फिर वही स्फूर्ति लौट आती है, जैसे वर्षों पीछे लौट गई हों। और मैं, उस संदूक को निहारते हुए, महसूस करती हूँ कि उसमें सिर्फ़ माँ का ही नहीं, मेरा भी जीवन धीरे-धीरे सिमट आया है — तस्वीरों, कपड़ों और दस्तावेज़ों के रूप में। यही तो है “संदूक भर जीवन।”

Read More

छोड़ आये अपना वो गांँव…

“छोड़ आये अपना वो गाँव” में कवि अपने बचपन और गाँव की यादों को भावपूर्ण ढंग से व्यक्त करते हैं। यह कविता गाँव की सरल, प्राकृतिक और आत्मीय जीवन शैली के सुंदर चित्रण से भरी है—बैलगाड़ियाँ, खेतों की हरियाली, पनिहारन की पायल की झनकार, बुजुर्गों की चौपाल और सुबह की ग्रामीण रौनक। शहर की चमक-धमक, गगनचुंबी इमारतें और व्यस्त जीवन के बीच कवि को गाँव की मिट्टी, पेड़ों की छांव और अपनापन याद आता है। कविता यह दर्शाती है कि चाहे जीवन कितनी भी व्यस्त या आधुनिक क्यों न हो, अपने गाँव और सरल जीवन की याद हमेशा हृदय में बनी रहती है, और व्यक्ति को फिर से लौटने की लालसा जगाती है।

Read More

जिंदगी के पन्नों में तुम्हारा स्पर्श

मैं एक किताब थी, धूल भरी लाइब्रेरी के कोने में पड़ी हुई। पन्ने पुराने थे, कवर किसी को आकर्षित करने लायक नहीं। एक ऐसी किताब जिसे शायद ही कभी पढ़ा गया हो।

एक दिन तुम मुझसे टकराए। तुमने मुझे उठाया और पढ़ना शुरू किया। पहले पन्ने पर मेरी प्रस्तावना पढ़ते ही मुझे डर लगा कि अब तुम मेरी सोच और भावनाओं को आंक दोगे। पर जैसे ही तुमने आगे पढ़ा, तुम मुस्कुराए। तुम्हारी मुस्कान ने मुझे जिम्मेदारी का एहसास कराया – कि तुम्हें निराश नहीं होने दूँगी।

Read More

फ़िरोज़ी मफ़लर

नवंबर की पीली शामों में अकेले बाहर न निकलो। इस महीने की धूप छलावा है—तुम उसकी गुनगुनी ऊँगली पकड़कर चलते रहोगे, और वह अचानक किसी और के साथ भाग जाएगी। फिर तुम्हें रास्ता भी नहीं मिलेगा, क्योंकि सूखे पत्तों के बीच हमेशा हरे-भरे पत्ते खो जाते हैं।

ठहरो… कहा तो था कि हम तुम्हारे साथ चलेंगे। पिछले बरस का तुम्हारा अधूरा फ़िरोज़ी मफलर अब बुनाई के अंतिम मोड़ पर है। आओ, मिलकर सर्दियों की तैयारियाँ करें—हम दोनों साथ।

Read More

वो गाँव की कच्ची सड़क…

गाँव के बदलते स्वरूप और उसमें आने वाले शहरीकरण की भावनात्मक तस्वीर पेश करती है। कच्ची सड़कें अब काली, चौड़ी और बदल चुकी हैं, दोनों तरफ हरियाली से लहलहाते खेत अब दुकानों और व्यावसायिक स्थलों में बदल गए हैं। गाँव के लोग और उनकी सरल जीवनशैली धीरे-धीरे शहरी अंदाज़ और मुखौटे में बदल रही है। सुनार की जगह ज्वैलर्स, भड़भूजे और चने की जगह पॉपकॉर्न जैसी चीजें गाँव में जगह लेने लगी हैं। जबकि यह विकास और सुविधा का प्रतीक है, कवि अपने पुराने प्यार और ग्रामीण सादगी को याद करता है और मन में कचोट अनुभव करता है।

Read More

मकाँ

एक जर्जर मकाँ खंडहर की तरह ढहता दिखाई देता है। कभी उसी छत के नीचे बच्चों की चहचहाहट गूँजती थी, माँ और बाबा की बातें घर को जीवंत बना देती थीं। आज वातावरण उदासी और रंजो-ग़म से भरा है, मानो साँसें भी उखड़-सी गई हों। दिल बार-बार उसी पुराने आशियाने को ढूँढता है, जहाँ अपनापन और जीवन की गर्माहट हुआ करती थी।

Read More

ज़िंदगी गुनगुनाने लगी

अब ज़िंदगी मानो गुनगुनाने लगी है। हवा की धीमी-धीमी बयार की तरह इसमें मिठास घुलने लगी है। मीठे सपनों की छाँव में रात भी अलसाई-सी करवट लेती है। मन अजीबोगरीब खयाल बुनता रहता है और उजली चांदनी-सी उम्मीद सँजोए रहता है।

बातों और मुलाक़ातों का सिलसिला लगातार चलता है, फिर भी दिल के भीतर कहीं एक हल्की-सी खलिश बनी रहती है। बीते दिनों में चारों ओर दावानल था, घाव भी हरे-भरे थे। ऐसे कठिन समय में उसकी बातें मोगरे की महक जैसी सुकून देती थीं।

Read More