तुम्हारे बाद भी, तुम्हारी निशानियाँ

तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारी हर छोड़ी हुई चीज़—कपड़े, प्याली, तौलिया—मुझे तुम्हारी याद दिलाती है। तुम बिखेरते जाते हो और मैं उन्हें जतन से सहेजती जाती हूँ, क्योंकि इन्हीं में हमारा रिश्ता साँस लेता है।”

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चाय की ख़ुशबू और यादों की परतें

चाय की ख़ुशबू संग जब यादों की परतें खुलती हैं,
तो ज़िंदगी में खोया-पाया सब सामने आ खड़ा होता है।दिल अक्सर सोचता है — काश! जो चाहा था, वही मिल जाता… या ज़िंदगी एक और मौका देती।”

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जिंदगी और कट चाय

पल-पल बीतते जा रहे हैं, और जीवन का रस धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। इसलिए बेकार की बातें छोड़कर मौजूदा समय का आनंद लेना चाहिए। मित्रों के साथ बिताए गए पल, उनकी हँसी, कभी-कभी उनके आँसुओं की चिंता, और साथ में पी गई चाय—ये सब छोटी-छोटी खुशियाँ जीवन को पूर्ण बनाती हैं। यह कविता समय की अनवरत गति, मित्रता, साधारण सुख और जीवन के क्षणों की क़ीमत का स्मरण कराती है।

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अधूरी बारिश की दास्तान

गाँव का पता ही भूल गया हो। बादल चिट्ठियों की तरह आते हैं, लेकिन बिना संदेश दिए लौट जाते हैं। जिन पर “देवभूमि” लिखा होता है, वहाँ तो मेघदूत की तरह वे आँसू और वज्र के साथ बरसते हैं, पर यहाँ आँगन उमस और प्रतीक्षा में सूखा पड़ा है। खपरैल की छतें अब भी बारिश का पानी सोखने को तैयार बैठी हैं, और पेड़ों से पत्ते पीले होकर झरते जा रहे हैं। इस चित्रण में वर्षा की अनुपस्थिति केवल मौसम का अभाव नहीं है, बल्कि एक गहरी भावनात्मक कमी और विरह का प्रतीक बन जाती है।

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माँ का पीतल का संदूक

माँ का पीतल का संदूक—छोटा, पर सोने-सा चमकता। उसमें सहेजे गए गहने, सिक्के, पान और यादें पीढ़ियों की परंपरा और स्नेह का दीप हैं। बचपन से मुझे खींचने वाला यह संदूक अब मेरी नई यादों और ज्वेलरी का घर बन गया है।

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सफ़र

ऐ वक्त, ज़रा ठहर जा। मुझे अपने आप से कुछ बातें करनी हैं। यादों की किताब में बिखरे किस्सों को फिर से पढ़ना है। बचपन के उन दिनों को याद करना है जब बेख़ौफ़ होकर खेलते और रातों को आसमान में तारे गिनते थे। सखियों संग बिताए यौवन के मधुर पलों को जीना है, जब बातें करते-करते पहर बीत जाते थे। बाबुल का घर, अम्मा का आंचल और भाई-बहनों का साथ छूटने की कसक अब भी भीतर कहीं घुटती है। सात वचन लेकर शुरू हुए नवजीवन की यादें भी हैं, जो धीरे-धीरे गृहस्थी की उलझनों में बिखर गईं। बच्चों की किलकारियों से गूंजते घर का आनंद था, जिसमें रातें भी उजली लगती थीं। समय कैसे बीत गया, यह समझ ही नहीं आया। अब जीवन की भाग-दौड़ में, शेष बची स्मृतियों के सहारे, सफ़र मानो शून्य की ओर बढ़ता जा रहा है।

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आधुनिक रिश्तों में दूरी और भावनात्मक अकेलेपन को दर्शाता उदास प्रेम दृश्य

…जब मोहब्बत नुमाइश बन गई

अब मोहब्बत भी लिबासों की तरह हो गई है – रोज़ बदलती, ज़माने की रवायत बन चुकी। कभी जो खतों में दिल की धड़कनें उतरती थीं, अब वो सिलसिला कहीं खो गया है। प्यार की जगह नुमाइश रह गई है।

इश्क़ का मिज़ाज देखकर लगता है कि लोगों के पास अब बस फुरसत ही फुरसत है, लेकिन मोहब्बत की असल सदाएं कहीं गुम हो गई हैं। चाहत अब इबादत बनकर रह गई है, और वफ़ा के नाम पर धोखे मिलना किस्मत। आज दुआएं भी सिक्कों में लुटती हैं, अमीरी भी ज़लालत सी लगने लगी है। इरादों को गलत अंजाम देना दीवानों की हिमाकत कहलाता है और बिना वजह इल्ज़ाम लगाना, सियासत।

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ख़त अपने नाम…

आज का खयाल सीधा दिल को छू गया—क्यों न खुद से ही अपनी कीमत पूछी जाए, बजाय दूसरों की नज़रों में ढूँढ़ने के। क्यों न एक ख़त खुद को लिखा जाए, जिसमें अपने ही बचपन की हँसी, अपनी ही रंगीन तितली-सी चंचलता, और अपनी ही खुशबू को फिर से महसूस किया जाए। जीवन की भाग-दौड़ में खोकर हम खुद को सँवारना भूल जाते हैं, लेकिन जब खुद से मुलाक़ात होती है, तो एहसास होता है कि सबसे बड़ा ख़िताब, सबसे सुंदर परिभाषा, हमेशा से हमारे अपने ही नाम थी।

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राखी के धागों में उलझा बाज़ार और बदलते रिश्तों का रंग

स्नेह के धागों से सिक्त भाई-बहन के बीच अटूट प्रेम का उत्सव है रक्षाबंधन। पर जिस तरह हर त्योहार बाज़ारवाद की भेंट चढ़ता जा रहा है, वहीं रक्षाबंधन का यह पावन पर्व भी इससे अछूता नहीं रह गया। शायद यही कारण है कि आज त्योहार मनाने से पहले हर किसी को अपनी जेब टटोलनी पड़ती है। आखिर, बाज़ार की चमक-दमक और महंगे से महंगे तोहफ़े खरीदने की होड़ ने आम आदमी के हृदय में उपजने वाली उत्सव की सहज भावनाओं को कहीं न कहीं दबा दिया है।

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आजन्म बिछोह

इस बार की यात्रा वैसी नहीं थी जैसी पहले हुआ करती थी। न तस्वीरें देखीं, न डायरी लिखी — मन एक अजीब उचाट, थका और शून्य में डूबा हुआ है। जूड़े के फूलों के बीच अब एक जोड़ी उदास आँखें महसूस होती हैं, जो स्मृतियों की तरह टंगी रह गई हैं। हर बार की तरह यह यात्रा आनंद नहीं, बल्कि एक सैलाब छोड़ गई — भावनाओं का, बिछोह का, और उस प्रेम का जो चुपचाप आता है और सब बहा ले जाता है। इस बार आषाढ़ केवल मौसम नहीं, एक डूबती आत्मा का रूप बन गया है। न प्रतीक्षा है, न वचन, न कोई सहारा — बस एक अंतहीन दूरी, जहाँ अगली मुलाकात की कोई संभावना नहीं। इस प्रेम की परिणति नहीं, केवल आजन्म बिछोह ही लिखा है।

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