कैसे करूं बयाँ…

चन्द्रवती दीक्षित, करनाल (हरियाणा)

मई का महीना था। ईश्वर की असीम कृपा से श्री केदारनाथ के दर्शन की अभिलाषा पूर्ण हुई। हमारे साथ एक अन्य परिवार भी यात्रा में सहभागी था। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते गए, रास्ते के अद्भुत नज़ारे मन को मोहते चले गए। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो प्रकृति स्वयं हमारा आलिंगन कर रही हो। केदारनाथ दर्शन से पूर्व हम बद्रीनाथ धाम पहुँचे। वह स्थान पावनता और अद्वितीय आस्था का अनुपम प्रतीक है। वहाँ पहुँचते ही आत्मा में एक अजीब-सी शांति और नई ऊर्जा का संचार होने लगा। गरम जल और ठंडे जल की धाराएँ मानो साक्षात परमात्मा के दर्शन करा रही हों। उस दिव्य अनुभव को शब्दों में बाँध पाना सहज नहीं था।

इस अविस्मरणीय यात्रा के बाद हम केदारनाथ की ओर प्रस्थान कर गए। रास्ते में घने जंगल, निर्मल नदियाँ, ऊँचे पर्वत और टेढ़े-मेढ़े रास्ते हर क्षण को आनंदमय बना रहे थे। अगले दिन सुबह हम केदारनाथ धाम पहुँच गए। चारों ओर बर्फ से ढके पर्वत, विभिन्न प्रकार के वृक्ष, संकरी पगडंडियाँ और जीवन संघर्ष से भरे परिश्रमी चेहरे सब कुछ देखते ही बनता था।

हाड़ कंपा देने वाली ठंड यात्रा के आनंद की परीक्षा ले रही थी। ऊपर से बर्फ ऐसे बरस रही थी मानो सर्दी अपने सारे रिकॉर्ड तोड़ने पर आमादा हो। फिर भी दर्शन तो करने ही थे। दर्शन के बाद शीतल मौसम की मार सहते हुए हम शाम को होटल पहुँचे ही थे कि सर्द हवाओं के साथ बारिश ने हाल बेहाल कर दिया। हमारे साथ तीन वर्ष का छोटा बेटा भी था। पर्याप्त गरम कपड़े होने के बावजूद ठंड असहनीय हो गई। थकान और चिंता के कारण पति-पत्नी के बीच कहासुनी भी हो गई।इसी बीच लगभग पंद्रह-सोलह वर्ष का एक मासूम लड़का गरम चाय लेकर आया। उसने हमारी स्थिति तुरंत समझ ली और बिना कुछ कहे एक कंबल ले आया। बड़े स्नेह से उसने कहा कि बच्चे के नीचे बिछा लीजिए।

आप विश्वास नहीं करेंगे, उसकी आँखों और व्यवहार में कर्तव्यनिष्ठा और निश्छल प्रेम का सागर छलक रहा था। कुछ देर बाद वह एक बिस्किट का पैकेट भी ले आया। उस समय रात के लगभग बारह बज रहे थे और आसपास कोई दुकान नहीं थी। उसकी इंसानियत ने हमें स्तब्ध कर दिया।

मैंने बैग से सौ रुपये निकालकर उसे देने चाहा, पर उसने हाथ जोड़कर सख्ती से मना कर दिया। तब हमने आग्रह किया“बेटा, यह हमारी ओर से आशीर्वाद की भेंट है। इसे स्वीकार करना ही होगा।” हमारे प्रेमपूर्ण आग्रह पर उसने विनम्रता से वह भेंट स्वीकार कर ली।

उस क्षण मन स्वतः ही प्रार्थना में डूब गया

अथाह प्रेम का सागर तुम,
समर्पण भाव से करते काम।
श्री हरि से यही प्रार्थना,
पूरी करें तुम्हारी आशा तमाम।

इतना कहते ही हमारी आँखों से प्रेम के आँसू बह निकले। वह लड़का मुस्कुराकर बोला—“आते रहिएगा, हम इंतज़ार करेंगे।” ईश्वर की उस विरल कृपा और निश्छल प्रेम का उपहार पाकर हम प्रकृति और परमात्मा को नमन करते हुए अपने वापसी के गंतव्य की ओर चल पड़े।

आज भी उस पावन और निष्कलुष प्रेम की तरंग हमारे मन-मंदिर को आलोकित करती है और प्रेम के पथ पर चलने की प्रेरणा देती रहती है।

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