कैसे करूं बयाँ…
केदारनाथ की कठोर ठंड और विपरीत परिस्थितियों के बीच एक मासूम बालक का निश्छल प्रेम यह सिखा गया कि सच्ची मानवता किसी सुविधा या संपन्नता की मोहताज नहीं होती. वही निस्वार्थ सेवा जीवन भर स्मृति बनकर हृदय में बस जाती है.

केदारनाथ की कठोर ठंड और विपरीत परिस्थितियों के बीच एक मासूम बालक का निश्छल प्रेम यह सिखा गया कि सच्ची मानवता किसी सुविधा या संपन्नता की मोहताज नहीं होती. वही निस्वार्थ सेवा जीवन भर स्मृति बनकर हृदय में बस जाती है.
नवपल्लवित पौधा अपनी कोमल जड़ों से धरती का आशीर्वाद लेकर जीवन की नई शुरुआत करता है। वह नव अंबर और नव भोर के साक्षी के रूप में जन्म लेता है, अपने भीतर जीवन की नयी आस संजोए हुए। चारों ओर फैले उपवन की मधुर सुवास उसे उल्लास से भर देती है। वह अभी शिशु है, पर हर दिन वायु और जल का स्पर्श पाकर बढ़ने की आकांक्षा रखता है।
वह जानता है कि एक दिन वह विशाल वृक्ष बनेगा—जिसकी छाया में संसार विश्राम करेगा, जो अनगिनत जीवों को ऑक्सीजन और जीवनदान देगा। उसका अस्तित्व निःस्वार्थ है, उसका हर अंश किसी न किसी के काम आने वाला है