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कैसे करूं बयाँ…

केदारनाथ की कठोर ठंड और विपरीत परिस्थितियों के बीच एक मासूम बालक का निश्छल प्रेम यह सिखा गया कि सच्ची मानवता किसी सुविधा या संपन्नता की मोहताज नहीं होती. वही निस्वार्थ सेवा जीवन भर स्मृति बनकर हृदय में बस जाती है.

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 सोच बदल गई

कभी-कभी हमारी भलाई की सोच भी सामने वाले के लिए बोझ बन जाती है. नीलम ने यह समझा कि उपहार की कीमत से ज़्यादा उसकी गरिमा और अपनापन मायने रखता है. सीमा के एक सधे हुए उत्तर ने नीलम की सोच बदल दी और यह सिखा दिया कि उपहार महँगा नहीं, बल्कि नया और सम्मानजनक होना चाहिए.

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खुद से खुद की जंग

तुम्हारे जाने के बाद ज़िंदगी अचानक खाली हो गई थी। जो आदतें कभी सुकून देती थीं, वही अब चुभने लगीं। तब समझ आया कि सहारे पर जीना आसान होता है, पर खुद खड़े होना सीखना ज़रूरी। उसी खालीपन में मैंने खुद को पहचाना और धीरे-धीरे अपनी ही ज़िंदगी की लड़ाई लड़ना सीख लिया।

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10 रुपये की कीमत

आज़ादी के बाद के दिनों में दो घनिष्ठ मित्र थे .एक धनी, एक साधारण।
एक दिन निर्धन मित्र ने 10 रुपये उधार लिए और फिर अचानक परिवार सहित कहीं चला गया।
25 साल बाद लखनऊ के एक होटल में दोनों अचानक मिले वही साधारण मित्र अब होटल मालिक बन चुका था।उसने कहा “मैं वो 10 रुपये वापस नहीं दूँगा, क्योंकि उन्हीं 10 रुपयों ने मुझे आज ये पहचान दी है।”

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