
विजयलक्ष्मी सिंह, प्रसिद्ध लेखिका
प्रकृति की अद्भुत कृति को
सबने खूब सराहा,
धरती से अम्बर तक जिसने
अद्भुत रूप बनाया।
चित्रकार ने गढ़े पुतले माटी के और
उसमें जीव बसाया,
दी रोशनी चाँद-सूरज से,
तारों को खूब चमकाया।
प्रकृति की अद्भुत कृति को
सबने खूब सराहा।।
खेत-खलिहान, फल-फूल
और पेड़-पौधे खूब लगवाए,
पीने को पानी, नदियों की
कलकल ध्वनि से मधुर संगीत बनाए।
वृद्ध, जवान, धनवान-गरीब पर
एक-सा सूर्य चमकाया,
रात्रि एक-सी कर दी सबकी,
निद्रा में सबको सुलाया।
प्रकृति की अद्भुत कृति को
सबने खूब सराहा।।
तेरी अजब है कारीगरी,
बड़ी हिकमत से माया दिखलाया,
वेद-किताबें रचीं सब बढ़कर,
बुद्धि-विवेक दिलवाया।
हरियाली फैलाई जिससे
श्वास में शुद्ध स्पंदन आया,
पढ़े-लिखे सब स्वस्थ रहें
और देश को उन्नत बनाया।
प्रकृति की अद्भुत कृति को
सबने खूब सराहा।।
सत्य का साक्षात्कार कराने को
मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारा बनवाया,
कुछ पल हों साधना के अवश्य,
जिससे मानव सुकून पाता।
चरण ग्रहण सद्गुरु का कर
सच्चे मार्ग पर चलता जाता,
धन्य-धन्य करता है जगत को
और मुक्ति मार्ग बतलाता।
प्रकृति की अद्भुत कृति को
सबने खूब सराहा।।
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