अधूरी पहचान

गहनों की बेड़ियों में बंधी हुई एक महिला, जो समाज में नारी की स्थिति और संघर्ष को दर्शाती है देवी नारी की यही विडंबना है

अलका ‘ राज़ ‘अग्रवाल

नारी को दिखा आईना यूँ,
उलझा दिया गया,
बखान करके हुस्न का,
बहला दिया गया।

न हक दिया कोई भी,
न दर कहीं दिया,
बस हमसफ़र के नाम का
रुतबा दिया गया।

छूती रही जब पैर, समझा
पति को जब ख़ुदा कहा,
फिर कैसे उसको घर की ही
दासी बना दिया गया।

चलती रहे चक्की और
जलता रहे चूल्हा इसलिए,
बस नारी को एक नाम देकर
अन्नपूर्णा बना दिया गया।

न बराबर का हक माँगे, बस
न कुछ बोल ही सके,
इसलिए नारी को दुर्गा माँ
बोल मान दिया गया।

चाँदी-सोने की हथकड़ी-सी
ऐसी नकेल की बेड़ियाँ,
कंगन, पायजेब, नथनियाँ
इन्हीं ज़ेवरों की जंजीर से बाँध दिया गया।

व्यभिचार की लालसा में आदमी,
जब उसको रोक न सका,
साज-श्रृंगार और पहनावे को लेकर
तोहमत उस पर लगा दी गई।

नौ माह अपने ख़ून से सींच
बच्चे का बचपन जवान किया,
बेटों को नाम पिता का दे,
माँ की क़ुर्बानी भुला कर
नाम पिता का दिया गया।
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