…जब मोहब्बत नुमाइश बन गई

आधुनिक रिश्तों में दूरी और भावनात्मक अकेलेपन को दर्शाता उदास प्रेम दृश्य

उषा शर्मा, प्रसिद्ध लेखिका, जामनगर

लिबासों सी मुहब्बत हो गई है,
ज़माने की रवायत हो गई है।

खतों का अब न कोई सिल सिला है,
नुमाइश जो मुहब्बत हो गई है।

मिजाज़े इश्क़ देखा जो लगा है ,
उन्हें भी खूब फुरसत हो गई है।

मिलीं ना जो मुहब्बत की सदाएं,
तिरी चाहत इबादत हो गई है।

वफ़ा के नाम बस धोखे मिले हैं
हमारी अब ये किस्मत हो गई है।

दुआ के नाम पर सिक्के लुटाते,
अमीरी भी ज़लालत हो गई है।

इरादों को गलत अंजाम देना,
दिवानों की हिमाकत हो गई है।

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4 thoughts on “…जब मोहब्बत नुमाइश बन गई

  1. बहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीय सर जी मेरी रचना को स्थान देने के लिए 🙏

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