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भरोसे की जिंदगी

भरोसा जीवन की वह डोर है, जो हमें स्वयं से लेकर दूसरों और अंततः ईश्वर तक जोड़ती है। विपरीत परिस्थितियों में जब अपने प्रयास नाकाफी पड़ जाएँ, तब किसी अपरिचित का बढ़ा हुआ हाथ ईश्वर जैसा लगता है। जीवन की यह राह आपसी विश्वास पर ही चलती है और अंत में भरोसा यही कहता है, “जो भी होगा, अच्छा ही होगा।”

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आसरा

पने भीतर के अदृष्ट संसार और भावनाओं की गहराई को व्यक्त करती हैं। यह कविता यादों, अनुभवों और उन कहानियों की प्रतीक है जो हमारे मन में ठहरी रहती हैं—जैसे कवियों की स्मृतियाँ, वर्जीनिया का मौन, मीरा का विस्मय और अजनबी महिलाओं की अधूरी चिट्ठियां। इस अदृश्य संसार के बीच, कवयित्री अपने विचारों को हर रात धीरे-धीरे खो देती हैं, जैसे कोई ज्योत अपने ही प्रकाश से थक गई हो। अंततः, एक प्रिय व्यक्ति की निस्पंद धड़कनों में मिलने वाला आसरा उसे थके हुए मन को सहारा देने और हृदय का भार साझा करने की अनुभूति कराता है।

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जीवन संघर्ष कविता

ज़िंदगी लेती है नए इम्तिहां

ज़िंदगी हमेशा नए-नए इम्तिहान लेती है। कभी वह मीत बनकर साथ देती है, तो कभी गिला करके दूर चली जाती है। दिल में आने वाले हर दिलकश एहसास का ज़रिया भी वही है। वह कभी हमें प्यार करना सिखाती है, तो कभी अहंकार से टकरा देती है। हर मोड़ पर उसके इम्तिहान अलग होते हैं—कभी तेज़ आँधियों के थपेड़े, तो कभी दर्द से भरा लंबा कारवाँ।

ऐसा मन होता है कि चाँद का एक टुकड़ा और आसमान की एक मुट्ठी पाकर, उन्हें पर्स में छुपा लिया जाए, ताकि कुछ पल सुकून के मिल सकें। उलझनों के बीच भी ज़िंदगी का ही सहारा है, पर उसकी खुशियों की चादर के नीचे दर्द का पाला भी बिछा है। सपनों के परिंदे अब भी उड़ान भरते हैं, मगर छोटे-छोटे ज़ख्म मिलकर एक काफ़िला बन गए हैं। ज़िंदगी ही मेरी साज़ है और मेरी सदा भी। उसी के साथ जीया है और उसी में मैंने अपने भगवान को खोजा है। हर लम्हा नया था, हर दर्द सहा—लेकिन अब दिल चाहता है कि वह थोड़ा ठहर जाए और मेरी हथेली में कुछ हसीं फूल खिला दे।

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मैं एक दीवार हूँ: मौन सहारा, दर्द और इतिहास की संवेदनशील कविता

ऐतिहासिक दीवार

मैं एक पुरानी दीवार हूँ बोलने में असमर्थ, फिर भी सबके दुःख-दर्द, गुस्से और उपेक्षा की साक्षी| लोग अपने विषाद, हँसी, और थकान को मुझ पर टांग जाते हैं जैसे कोई पोस्टर दीवार पर चिपकाता है| जब वे मेरी पीठ से सिर टिकाकर बैठते हैं, मैं उन्हें मौन सहारा देती हूँ्| फिर भी, बदले में मुझे गालियॉं और अपमान मिलता है जैसे कोई पान की पीक थूक देता हो| मैं पुरानी जरूर हूँ, टूटने की कगार पर भी, लेकिन मेरे भीतर इतिहास छिपा है मैं ऐतिहासिक हूँ्

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