gulmohar
महंगाई से परेशान आम आदमी और बढ़ती कीमतों का प्रतीकात्मक दृश्य

बढ़ती महंगाई

यह कविता नारद जी और महंगाई के संवाद के माध्यम से समाज की विडंबना को उजागर करती है। महंगाई खुद को निर्दोष बताती है और असली जिम्मेदारी सत्ता और व्यवस्था पर डालती है जो इस व्यंग्य को और भी प्रभावशाली बनाता है।

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