
पलक गुप्ता, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)
कभी दुर्गा का तेज है इसमें,
तो कभी गंगा की निर्मल धारा है।
कभी ममता की छाँव घनी,
तो कभी प्रचंड अग्नि की ज्वाला है।
कभी सीता-सा धैर्य समेटे,
वन-वन दुःख को सह जाती है।
कभी द्रौपदी बन अन्याय के विरुद्ध,
सभा के मध्य गरज जाती है।
कभी यशोदा की ममता बनकर,
संसार को प्रेम सिखाती है।
कभी झाँसी की रानी बनकर,
रणभूमि में ध्वज लहराती है।
इसके आँचल में स्वर्ग बसा है,
इसके नयनों में सागर गहरा।
इसके त्याग की कोई सीमा नहीं,
इसका हृदय हिमालय-सा ठहरा।
कभी सावित्री-सी अटल निष्ठा,
मृत्यु से भी जो लड़ जाती है।
कभी मीरा-सी प्रेम-दिवानी,
विष पीकर भी मुस्काती है।
यह केवल देह नहीं,
यह सृष्टि का आधार है।
इसके बिना अधूरा जीवन,
इसके बिना सूना संसार है।
जब-जब इसने मौन तोड़ा,
इतिहास नया बन जाता है।
जब-जब यह शिक्षा पाती है,
समाज नया हो जाता है।
नारी केवल शब्द नहीं,
संघर्षों का सम्मान है।
नारी केवल शक्ति नहीं,
मानवता की पहचान है।
कभी कलम, कभी तलवार है,
कभी सृजन, कभी संहार है।
नारी को जो समझ सका,
उसने समझा सारा संसार है।।

अप्रतिम रचना के लिए ढेरों बधाई 🫂💐💕
बहुत-बहुत धन्यवाद! 🙏💖
आपके स्नेह और प्रोत्साहन ने मेरी रचना को और भी सार्थक बना दिया। ऐसे ही अपना प्यार और आशीर्वाद बनाए रखिए। 🌸✨
आप लिखती रहें इसी तरह और इस मंच पर कई प्रतिष्ठित लेखक और रचनाकार मौजूद हैं आप उनकी भी रचनाएं पढ़ती रहें. उनसे भी आपको मार्गदर्शन मिलता रहेगा. आपके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं
बहुत-बहुत धन्यवाद! 🙏💖
आपके स्नेह और प्रोत्साहन ने मेरी रचना को और भी सार्थक बना दिया। ऐसे ही अपना प्यार और आशीर्वाद बनाए रखिए। 🌸✨
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शब्दों में नारी की महिमा का अद्भुत चित्रण। ❤️