
सुनील परिहार, महिदपुर रोड
मेरे घर आई एक नन्ही परी, चांदनी के हसीन रथ पे सवार…
यह गीत जब भी सुनता हूं, मेरी नजर अनायास ही रसोई के उस रोशनदान पर चली जाती है, जहां हर साल एक गौरेया का जोड़ा अपना छोटा-सा संसार बसाने आता है.वे आते हैं, तिनका-तिनका जोड़ते हैं, बिखेरते हैं, फिर समेटते हैं्.
कभी सूखी घास, कभी धागे का टुकड़ा, कभी किसी पेड़ का सूखा पत्ता. पूरे घर में उनकी मौजूदगी महसूस होने लगती है. रोशनदान के नीचे थोड़ा कचरा जमा हो जाता है, लेकिन हममें से कोई उसे हटाने की बात नहीं करता. क्योंकि वह कचरा नहीं होता, वह किसी के सपनों का घर बन रहा होता है.
इस साल भी ऐसा ही हुआ्. कुछ दिनों बाद घोंसले में अंडे दिखाई दिए्. फिर एक सुबह बहुत धीमी-सी आवाज सुनाई दी. जैसे किसी ने जीवन की पहली दस्तक दी हो.
मैंने ऊपर देखा. अंडों के खोल टूट चुके थे.
उनमें से एक नन्हा-सा चूजा अपनी गर्दन उठाने की कोशिश कर रहा था. उसकी आंखें पूरी तरह खुली भी नहीं थीं्. शरीर पर पंख नहीं, बस रूई जैसे मुलायम रेशे थे. वह बार-बार अपनी छोटी-सी चोंच खोलकर मां को पुकार रहा था.
उसे देखते ही मेरे मन में एक ही शब्द आया ‘परी’.वह सचमुच एक नन्ही परी थी.
उसकी हर चीं-चीं में जीवन का संगीत था. जब उसकी मां दाना लेकर आती, तो वह खुशी से अपनी गर्दन ऊपर उठा देती. कई बार मैं अपना काम छोड़कर उसे घंटों निहारता रहता. पता ही नहीं चलता कि समय कब बीत गया.
धीरे-धीरे वह बड़ी होने लगी. उसके शरीर पर पंख उग आए्. अब वह घोंसले के किनारे तक आकर बैठती और बाहर झांकती. उसकी आंखों में एक नई दुनिया देखने की उत्सुकता दिखाई देती थी.उसे देखकर मुझे अपने बच्चों का बचपन याद आता. कैसे वे भी कभी उंगली पकड़कर चलते थे, फिर धीरे-धीरे अपने पैरों पर खड़े हुए और एक दिन अपने सपनों की उड़ान भरने निकल पड़े. शायद हर मां-बाप के मन में वही भावना उस गौरेया के मन में भी रही होगी.
फिर वह दिन आया, जिसका इंतजार भी था और डर भी. मेरी नन्ही परी घोंसले के मुहाने पर बैठी थी. वह बार-बार अपने पंख फड़फड़ा रही थी. नीचे गहराई थी, सामने अनंत आकाश्.
कुछ पल के लिए वह ठिठकी.
मुझे लगा जैसे कोई बच्ची पहली बार स्कूल के दरवाजे पर खड़ी हो. उत्साह भी, संकोच भी, डर भी.
फिर अचानक उसने हिम्मत जुटाई्.
अपने नन्हे पंख फैलाए और हवा के भरोसे खुद को छोड़ दिया.
मेरा दिल एक पल को थम-सा गया.
लेकिन अगले ही क्षण वह उड़ रही थी.
पहले थोड़ी डगमगाई, फिर संभली और फिर आसमान का हिस्सा बन गई्.मैं बहुत देर तक उसे देखता रहा. जब तक वह आंखों से ओझल नहीं हो गई्.
उसके उड़ जाने के बाद घोंसला वहीं था, रोशनदान भी वहीं था, घर भी वही था, लेकिन पता नहीं क्यों एक खालीपन-सा महसूस हो रहा था. जैसे घर की कोई प्यारी सदस्य विदा होकर चली गई हो.
उस दिन समझ आया कि मोहब्बत का सबसे सुंदर रूप साथ रखना नहीं, बल्कि उड़ जाने की आजादी देना है.
आज भी जब सुबह रसोई में जाता हूं, तो अनायास ही मेरी नजर उस घोंसले पर चली जाती है. वहां अब सन्नाटा है, लेकिन उस सन्नाटे में भी उसकी मासूम चीं-चीं गूंजती रहती है.
और मैं मन ही मन मुस्कुरा उठता हूं..मेरे घर आई एक नन्ही परी…..
कुछ दिनों के लिए ही सही, लेकिन उसने मेरे घर के साथ-साथ मेरे दिल में भी अपना एक छोटा-सा घोंसला बना लिया था.

बहुत सम्वेदनशील सृजन
छोटी चिड़िया को माध्यम बना कर आपने क्या खूब लिखा
बहुत सुंदर दिल की गहराई तक झकझोर गयी आपकी आलेख और सच कहा है प्यार जताना नहीं आज़ादी देना होता है 👏👏