
प्रीति अरोरा, बदायूं (उत्तर प्रदेश)
डूबा है मन का चांद उदासियों की चांदनी में
तेरे लौटने की आस का सूरज तो दिखाते जाते
बनाया था तेरे मकां को अपने ही हाथों से घर मैने
मेरे एहसास से अपने एहसास तो मिलाते जाते
ये जो रुस्वा कर हमे बन गए हो महफ़िलनशी
हमारी तन्हाईयों का हिसाब तो समझाते जाते
मशहूर हो चले हो अमीरी की रूबाइयों से
दिल-ए-गरीब पर भी एक इनायत तो फरमाते जाते
माना ख्वाबों का समुंदर है तैरकर जाना तुम्हें
इक नौका हकीकत की हमे भी थमाते जाते
सात फेरों के सात वचनों से बांधा था मुझे
इक वचन फ़क़त तुम भी निभाते जाते
