कुछ भी कहो…

सूर्योदय के समय चट्टान पर आत्मविश्वास से खड़ी भारतीय महिला, चेहरे पर दृढ़ता और शक्ति का भाव।

डॉ. पुष्पा जमुआर (लोक भाषा मंत्री,बिहार-हिन्दी साहित्य सम्मेलन), पटना

औरत कहो या नारी, या कहो स्त्री,
किसी भी नाम से पुकारो मुझे,
पर मैं हूँ शक्ति तुम्हारी।

खुद की राहें खुद गहती हूँ,
चाहे कितना भी बिछाओ लो काँटे,
काँटों पर चलना आता है,
तब काँटा शरमाता है।

मैं औरत हूँ…।

तुम्हारा तिरस्कार तड़पाता है,
अपमान सालता है,
फिर भी मैं अपना पथ गह लेती हूँ।

मैं नारी हूँ…।

समय से समय को चुरा कर
अपना सपना पूरा करने की कूबत रखती हूँ।

बहुत सहा तुम्हारा,
अब नहीं सह सकती हूँ।
जाग चुकी हूँ,
संघर्ष की रानी हूँ।

मैं औरत…।

थोड़ा सा आसमान
मुट्ठी में भर कर,
धरती पर पाँव मजबूती से रख कर
चलने की कला सीख ली है।

मैं औरत…।

मुझ में प्रविष्ट हैं
दया, क्षमा, सहनशीलता, ममता।

तुम मुझे नारी, औरत, स्त्री
जो भी कह कर हँसी उड़ाओ,
हार नहीं मानने वाली मैं,
कोमलांगी नहीं हूँ।

खुद को खुद के लिए तैयार किया है।
तुम्हारे जोड़ का तोड़
आत्मबल से तोड़ दिया है।
मैं शक्ति स्वरूपा हूँ।

मैं —

कठिनाइयों से जूझते हुए
आगे और आगे बढ़ रही है नारी।
अब अस्तित्व विहीन नहीं है नारी।

गर ढूँढोगे तुम तो पाओगे,
दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती का अंश है नारी।

जिनसे ये दुनिया आबाद हुई है,
वो गर्व है नारी।
पुरुष की जन्मदात्री है।

खुद को मौत से लड़ कर
तुम्हारा जीवन पाती है।

मैं औरत हूँ।
नारी हूँ।
स्त्री हूँ।

मैं प्रकृति, पुरुष की अर्धांगिनी हूँ।
किसी भी नाम से पुकारो मुझे,
पर हूँ मैं शक्ति स्वरूपा,
नर की नारायणी हूँ।

तुम किसी भी नाम से पुकारो मुझे,
मैं औरत, स्त्री, नारी, शक्ति स्वरूपा हूँ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *