जिंदगी में बदलाव जरूरी है

छोटी दुकान के सामने खड़े सफल व्यापारी योगेंद्र पोरवाल, संघर्ष से सफलता की प्रेरक कहानी

संघर्ष से सफलता तक योगेंद्र पोरवाल की प्रेरक कहानी

सुनील परिहार, महिदपुर रोड (जिला-उज्जैन)

जिंदगी कब कौन-सी करवट ले ले, यह कोई नहीं जानता. कभी खुशियों की बहार आती है, तो कभी जिम्मेदारियों का पहाड़ सामने खड़ा हो जाता है. लेकिन एक बात तय है. परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है. जैसे पतझड़ के बाद बसंत आता है, वैसे ही कठिन समय के बाद सफलता के अवसर भी आते हैं. जरूरत होती है तो सिर्फ बदलाव को स्वीकार करने की और हिम्मत से आगे बढ़ने की. ऐसी ही प्रेरक मिसाल हैं योगेंद्र पोरवाल, जिन्होंने जीवन की कठिन परिस्थितियों को हार नहीं, बल्कि नई शुरुआत का अवसर बनाया.
जिम्मेदारियों ने कम उम्र में बनाया मजबूत
साल 1996 में पिता के अकस्मात निधन के बाद मात्र 16 वर्ष की आयु में योगेंद्र पोरवाल के कंधों पर परिवार की जिम्मेदारियाँ आ गईं. उम्र छोटी थी, लेकिन हौसले बड़े थे. उन्होंने हालात से समझौता करने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुना और एक छोटी सी स्टेशनरी दुकान से अपने सफर की शुरुआत की. दुकान में पेन, पेंसिल, रबर, कॉपियां जैसी सामान्य सामग्री के साथ पहली से आठवीं तक की पाठ्यपुस्तकें भी रखीं. साथ ही पाठ्यपुस्तक निगम के डिपो से किताबें लाकर अन्य दुकानदारों तक पहुँचाने का कार्य भी शुरू किया.
समय के साथ बदला व्यापार
व्यापार में आमदनी सीमित थी, लेकिन सोच सीमित नहीं थी. उसी दौर में टेलीकॉम इंडस्ट्री में बदलाव आया और एसटीडी बूथ का चलन शुरू हुआ. योगेंद्र पोरवाल ने अवसर को पहचाना और अपनी दुकान में एसटीडी सुविधा शुरू कर दी.
धीरे-धीरे उनकी दुकान लोगों के बीच इतनी लोकप्रिय हुई कि लोग उसे जीएल एसटीडी के नाम से पहचानने लगे. रात 9 बजे के बाद कॉल रेट कम होने से लोगों की भीड़ लगती थी. लोगों की निजता को समझते हुए उन्होंने दुकान में एक अलग केबिन भी बनवाया, जहाँ लोग आराम से बात कर सकें. यह सिर्फ व्यापार नहीं था, यह समय के अनुसार खुद को बदलने की समझ थी.
बदलाव को अपनाया, इसलिए आगे बढ़े
जब मोबाइल फोन आम होने लगे और एसटीडी बूथ का दौर समाप्त होने लगा, तब भी उन्होंने हार नहीं मानी. उन्होंने फिर बदलाव स्वीकार किया और दुकान को प्रोविजनल व जनरल स्टोर के रूप में विकसित कर दिया. आज वहाँ किराना छोड़कर लगभग हर जरूरी सामग्री उपलब्ध है. स्टेशनरी, पतंजलि उत्पाद, सरकारी और निजी किताबें सब कुछ एक ही स्थान पर मिलने लगा. यही वजह है कि 1996 में शुरू हुआ छोटा सा सफर आज 30 वर्षों की मजबूत पहचान बन चुका है.
सिर्फ व्यापार नहीं, सेवा भी
एडवोकेट गोवर्धन लाल जी के नाम से स्थापित पुस्तक भंडार आज तीन पीढ़ियों से शिक्षा और समाज सेवा का केंद्र बना हुआ है. यह केवल दुकान नहीं, बल्कि विद्यार्थियों, अभिभावकों और समाज के लिए भरोसे का नाम है. परिवार के बड़े भाई अशोक पोरवाल जी भी उच्च पद पर सेवा दे रहे हैं, जिनके संस्कार और मार्गदर्शन ने इस यात्रा को मजबूती दी. पत्नी सपना पोरवाल सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय हैं और जांगड़ा पंच पोरवाल महिला मंडल की अध्यक्ष के रूप में समाज सेवा कर रही हैं. उनके बच्चे अथर्व और आशवी परिवार की नई उम्मीद हैं. योगेंद्र पोरवाल की कहानी हमें सिखाती है कि परिस्थितियाँ कठिन हों तो घबराना नहीं चाहिए,समय के साथ खुद को बदलना जरूरी है,छोटा काम कभी छोटा नहीं होता, मेहनत, ईमानदारी और धैर्य से हर सपना पूरा हो सकता है. इसके साथ ही परिवार और संस्कार सफलता की सबसे बड़ी ताकत होता है.
यह कहानी केवल एक व्यापारी की नहीं, बल्कि संघर्ष, आत्मनिर्भरता, बदलाव और सफलता की जीवंत मिसाल है.यदि जीवन में कठिन समय चल रहा है, तो याद रखिए. पतझड़ हमेशा नहीं रहता, बसंत जरूर आता है…बस चलते रहिए, बदलते रहिए और खुद पर विश्वास रखिए.

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