
मैंने धीरे से खिड़की के स्लाइडर को खिसकाया।
बारिश थम चुकी थी।
मैं बालकनी में आकर खड़ी हो गई। बारिश के बाद का मंजर मुझे हमेशा से भाता है। सूखे मैदान थोड़े समय के लिए ही सही, छोटे-मोटे ताल-तलैया का भ्रम देते हैं… पानी से नहाए हुए पत्ते, अपने पंखों को झाड़ते हुए पक्षी और बरसाती हवा! इन्हें कोई कैसे छोड़ सकता है!
अचानक नज़रें आसमान की ओर गईं।
5-6 घंटे की लगातार बारिश के बाद बूंदें थोड़ी हल्की हुई थीं।
आज केशू याद आ गया।
ऐसी ही एक बरसाती शाम थी। घटाटोप बारिश के बाद आसमान में निखर आया था इंद्रधनुष।
“मैं आपसे प्यार करता हूँ!”
अचानक ही कहा था उसने।
छत से खुले आसमान की ओर देखते हुए मैं चौंक गई थी।
“पागल हो क्या! बड़ी हूँ तुमसे!”
हड़बड़ाहट में इतना ही निकला था।
“हाँ तो! कितनी बड़ी हो गई हैं आप?”
उसने सहजता से पूछा।
मैं उसे डाँटने की जगह उँगलियों पर उम्र जोड़ने लगी।
“तकरीबन… 4-5 साल! देखो, मेरी मैथ्स कमजोर है, पर तुम हो तो छोटे न मुझसे! ऐसी बातें सोहती नहीं तुम्हें!”
“न सोहे! अच्छा, एक बात बताइए… इंसान की समझदारी ज्यादा मायने रखती है या उम्र?”
मैं जान रही थी वह क्यों पूछ रहा था, पर प्रश्न का सही जवाब देना ज़रूरी था, सो कहना पड़ा—
“समझदारी!”
“हम्म्! फिर उस हिसाब से मैं आपसे ज्यादा समझदार हूँ… ये… ये आपने ही कहा है कई बार! जब कभी आप किसी बात में उलझती हैं या फँसती हैं, तो मुझे फोन करती हैं… मुझसे कहती हैं उसे सुलझाने या आपको समझाने! एक बार नहीं, कई दफ़े आपने कहा है— तुम अपनी उम्र से आगे चलते हो! तो बताइए, फिर क्यों करना ये उम्रों का जोड़-घटाव!”
“बहस अच्छी कर लेते हो, पर मोरल ऑफ द स्टोरी ये कि बड़ी हूँ तुमसे मैं। और अब अगर तुम ये डायलॉग दोगे कि आप बड़ी हैं तो आप प्यार ज्यादा कर लेना… तो भई नहीं कर सकती मैं अपने से छोटे लड़के से प्यार! तुम्हें प्यार करने की इतनी ही सनक सवार है तो ढूँढो न अपने उम्र के लायक छोटी लड़की!”
चिढ़ गई थी मैं।
वह मुड़कर आसमान देखने लगा। चुप… उदास!
मुझे उसकी चुप्पी खली थी, पर मैं चाहती थी वह कुछ देर चुप ही रहे।
“मुझे लगता है अब तुम्हें निकलना चाहिए। क्या पता बारिश फिर से…”
वह चला गया। मुझे लगा था मेरी ना का असर हुआ है, पर ज़रूरी है जीवन में ना कहना! हर बार हम हाँ कह-कहकर जहन्नुम नहीं बना सकते जिंदगी को!
खैर, वह उस दिन तो चला गया, लेकिन एक सुबह चहकता हुआ मेरे दरवाजे पर खड़ा मिला।
पुराने यार हैं हम! तो ऐसे में उसे देखकर मुझे भी खुशी होती थी, और फिर उस दिन तो मेरा जन्मदिन भी था। दुगुनी खुशी!
उसने जन्मदिन की शुभकामनाएँ दीं और अपनी जेब से कुछ निकालकर मेरी तरफ बढ़ा दिया।
कानों की बालियाँ थीं, जिनके किनारों में सात रंगों के रेशम की छोटी-छोटी कलियाँ-सी लटक रही थीं।
मैं आमतौर पर कानों में कुछ नहीं पहनती। स्किन इतनी नाज़ुक है कि ज़रा वजन पड़ा और कान बिल्कुल लाल! बहुत ज़रूरी हुआ तो थोड़ी देर के लिए कभी-कभार…
“हैवी लग रही ये तो!”
इतनी बड़ी बालियाँ देखकर मैंने कहा था।
“बहुत हल्की हैं ये, देखिए।”
उसने बालियों पर फूँक मारी। रेशम की कलियाँ छिटक गईं।
“देखिए! मैंने कहा था न! मुझे पता है आप हैवी बालियाँ नहीं पहनतीं, पर एक बात कहूँ— आप पर बड़ी बालियाँ जँचती हैं… सूरज-चाँद, यहाँ तक कि पूरा ब्रह्मांड निकल जाता है उन बालियों के पार! बस मैं ही अटक जाता हूँ बीच में…! आपको याद है! आपकी एक तस्वीर है खिलखिलाती हुई… पीछे एक कतार से सरसों के फूल और आप… नीले कुर्ते, गोल झुमके पहने… मैं जितनी भी बार उस तस्वीर को देखता हूँ तो लगता है सब कुछ ठहर गया है, गुम हो गई है पूरी की पूरी दुनिया! सिर्फ मैं, आप और आपकी चाँद बालियाँ… झूलती हुई…!”
“केशू! चुप करो यार! तुमको एहसास है क्या-क्या कल्पनाएँ किए जा रहे हो तुम! जो जी में आए सोचो, पर मुझे मत बताओ प्लीज़! बड़ी हूँ तुमसे! मुनादी करवाऊँ क्या इसकी! दोस्त मानती हूँ, यही बहुत है, क्योंकि भाई-वई कहकर मुझे टैग नहीं लगाना अपनी दोस्ती को! देखो… अब जाओ तुम। आज ज़रा बिजी हूँ मैं!”
मैं पहली बार उस पर इतनी बुरी तरह झल्लाई थी।
अपने बेस्ट मित्र के ऊपर! कष्ट हो रहा था भीतर-ही-भीतर! पर क्या किया जाए!
“आपको दुःखी करने के इरादे से नहीं आया था, पर जन्मदिन के दिन उदास किया, उसके लिए माफ़ी! आगे से शिकायत का एक भी मौका नहीं दूँगा!”
चला गया था वह।
मैं कैसे कहती, दुःखी तो उसे मैं भी नहीं करना चाहती थी, पर…!
वक्त बीता, लेकिन इस बार कुछ ज्यादा ही बीत गया।
केशू नहीं आया।
उलझन-सी होने लगी। किससे पूछूँ, कहाँ गया लड़का आखिर!
पहले अपने दोस्तों से पूछा, जो उसके भी कॉमन फ्रेंड थे।
“नहीं! इधर उसका कोई मैसेज नहीं आया!”
कैसी दुनिया है। यहाँ अगर कोई इंसान खुद से पहल न करे, दिखे नहीं, तो उसकी खोज-खबर भी कोई नहीं लेता। गुम होना चाहते हो तो हो जाओ!
अब उसके दोस्तों से पूछने की बारी थी।
पहले ही दोस्त ने हँसते हुए कहा—
“अरे, उसको अभी फुर्सत कहाँ दीदी! नई गर्लफ्रेंड बनाई है नवाबजादे ने, उसी में फँसे पड़े हैं! हमारे साथ भी कम ही रहता है।”
मन कच्चा हुआ सुनकर! ठीक है, मेरी फीलिंग्स उसको लेकर वैसी नहीं थीं, लेकिन कुछ दिनों पहले मुझ पर मरा पड़ा था और तुरंत ही कहीं और सेट! आदमी है या सफेद पजामा, जो हर कुर्ते पर चल जाता है!
“मैसेज दूँ क्या उसे दीदी, बोल दूँ आप ढूँढ़ रही हैं उसे!”
“अरे नहीं! मौज करने दो लड़के को!”
दिन गुज़रे। मैं अपने काम में व्यस्त हो गई थी।
केशू की बातें धूमिल पड़ने लगीं, तभी एक रोज़ फोन बजा। नंबर अननोन!
“हैलो!”
“कैसी हैं आप!”
आवाज़ पहचानने में मुझे देर नहीं लगनी थी।
“केशू!”
“जी सरकार! खैरियत है, नाचीज़ को याद रखा गया है।”
पता नहीं क्यों, पर मुझे ज्यादा खुशी हुई नहीं थी उसकी आवाज़ सुनकर।
“हम्मम! बोलो, क्या सब चल रहा लाइफ में!”
मेरी आवाज़ में औपचारिकता थी।
“ओहो! इतनी फॉर्मल बातचीत! कोई पूछेगा नहीं मुझसे कहाँ थे, क्या कर रहे थे! केयर न सही, गुस्सा ही दिखा दें आप!”
मुझे फिर चिढ़ हुई थी। फिर भी स्थिर किया खुद को और…
“हाँ! पता चला था तुम कहीं और बिजी हो गए हो, ऐसे में क्या डिस्टर्ब करना! फिर मेरी खुद की जिंदगी में कम पेच-ओ-खम नहीं, जो कहीं और दिमाग लगाऊँ।”
“हह्ह्ह! अब समझा, मतलब आप तक बात पहुँच गई और आपकी नाराज़गी इसकी तस्दीक कर रही कि बुरा लगा है आपको मेरा कहीं और उलझना!”
मेरे कान गुस्से से गर्म हो गए। ऐसा लगा जैसे मुझे चिढ़ाया जा रहा था।
“बकवास क्यों कर रहे हो, केशू! इन छिछोरेपन से मुझे रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ता। हाँ, ये और बात है कि तुमने मेरे इस कथन को सत्य कर दिया कि उम्र में छोटे ही हो तुम, और मैच्योरिटी सही उम्र के बाद ही आती है।”
“मैं मैच्योर हूँ या नहीं, ये साबित नहीं करना था मुझे। आपने कहा था अपनी उम्र से छोटी लड़की ढूँढो, तो ढूँढी… लेकिन सच बताऊँ, प्रेम नहीं हुआ।”
“प्रेम ऐसे होता है क्या! इतना देखभाल कर!”
मेरी आवाज़ में व्यंग्य था।
“यही तो मैं कहना चाह रहा। इतना देखभाल कर प्रेम नहीं करते हम। पहले उम्र मिलाओ, फिर शौक, फिर समझदारी देखो। साला प्रेम न हो गया कोई सब्जी-भाजी! प्रेम को तो सरल होना चाहिए, अपने आप हो जाए, करना न पड़े… जैसे आपसे हुआ! खैर, सोच-समझकर बनाई गई प्रेमिका को बाय-बाय बोल दिया है। कल जा रहा हूँ वापस अपने गाँव! आपके शहर की रौनक रास नहीं आ रही। अब माँ की पसंद से शादी करूँगा, लेकिन प्रेम… उसे आपके देहरी पर छोड़ दिया है। आपके निकट जाने के लिए मुझे किसी निकटता की जरूरत नहीं है, विदा लेता हूँ!”
उसने फोन रख दिया।
मेरे शब्द मौन थे।
वह लड़का उम्र की गणित से कहीं आगे था, मैं बड़ी होकर भी पीछे रह गई। सोचती हूँ तो लगता है, काश मुझे भी उससे ऐसे ही प्रेम हुआ होता जैसे उसे मुझसे हुआ… पर हम शायद प्रेम को सही ढंग से परिभाषित भी नहीं कर पाते, जैसे उसने किया।
“ऊपर देखो! इंद्रधनुष!”
किसी ने हुलसकर कहा।
मैंने ऊपर देखा, इंद्रधनुष खिला था।
प्यारे लड़के, तुम जहाँ कहीं भी हो, ईश्वर तुम्हारे जीवन में ऐसे ही चमकीले रंग भरें।
मैंने आसमान की तरफ देखा और आँखें बंद कर लीं…!
ये रचनाएं भी पढ़ें–
यादें…
जिंदगी में बदलाव जरूरी है
नागफनी सी बेटियां !
ख़्वाब
वो गलियां

कितना बढ़िया लिखती हो…मौसमी 🫶💝
ग़जब की कहानी है मौसमी जी !
पूरे फ्लो में चलती हुई, ख़त्म हुई तो लगा सारे मौसम यहीं ठिठक गए।
हार्दिक बधाई 💐 🥰
उम्र के गणित…. उफ्फ!!!बेहद खूबसूरत…बेहद शानदार कहानी लेकिन विरह की टीस से मन को भारी कर गई।
बहुत प्यारी रचना 👌👌
हमेशा की तरह नि: शब्द
कहानी दिल को छू लेने वाली है।
हमेशा की तरह शानदार