
डॉ. पुष्पा जमुआर. पटना
“कल्पना, अरी ओ कल्पना! कहाँ हो? कब से बुला रही हूँ। सुन रही हो?” सुनीति ने गुस्से से आवाज़ दी।
“ओफ! अब क्या करूँ, न जाने कहाँ चली गई?” तभी कल्पना सामने आकर खड़ी हो गई और ढिठाई से कहा, “क्या है सुनीति दीदी, क्यों गला फाड़ रही हो? यहीं पर तो हूँ। बताओ, क्या काम है?” और मंद मुस्कान से सुनीति को चिढ़ाने लगी।
कल्पना की इस मुस्कुराहट पर झल्लाते हुए सुनीति ने कहा, “मैं क्या तुम्हारी नौकरानी हूँ, जो तुम्हें ढूँढ़ती फिरूँ? क्या वह लंगड़ा जतिन था?”
कल्पना -“हाँ! था तो?”
सुनीति चिढ़कर बोली, “तुम्हें बार-बार मना किया कि उसे अपने पास बुलाया न करो। ‘मरे’ तुम्हारे लिए तो वह संजय से भी अच्छा है।”
“दीदी, आज मेरा जन्मदिन है, सो उपहार देने आया था।”
सुनीति ने व्यंग्य से कहा, “अच्छा! लेकिन संजय का उपहार तुमने उठाकर फेंक दिया…!”
“दीदी, संजय की नज़र गंदी है, लेकिन जतिन एक सभ्य लड़का है। भाई की तरह है।”
इतना सुनते ही सुनीति निरुत्तर हो गई। जतिन की कही बातें उसके कानों में गूँजने लगी थीं
“दीदी, मुझे भी राखी बाँध दो। मुझ अनाथ को ईश्वर ने दो बहनें उपहार में दी हैं।”
वह अपनी सोच पर शर्मिंदा हो गई थी।
लेखिका के बारे में-
डॉ. पुष्पा जमुआर
समकालीन हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठित, बहुआयामी एवं सशक्त हस्ताक्षर हैं। वे बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन, पटना में लोकभाषा मंत्री के रूप में सक्रिय रहते हुए हिंदी तथा लोकभाषाओं के संवर्धन में निरंतर योगदान दे रही हैं। कविता, हाइकु, तांका, लघुकथा, आलोचना और संपादन जैसे विविध साहित्यिक विधाओं में उनकी सृजनधर्मिता उल्लेखनीय है।
उनकी प्रकाशित कृतियाँ— …और नदी बह चली, वक्त के साथ-साथ, टेढ़े-मेढ़े रास्ते, मेरे हिस्से का सूर्य, हिन्दी लघुकथा : समीक्षात्मक अध्ययन आदि— उनके व्यापक साहित्यिक दृष्टिकोण और रचनात्मक गहराई का प्रमाण हैं। हिंदी लघुकथा समीक्षा लेखन में उन्हें देश की प्रथम महिला लेखिका के रूप में विशिष्ट सम्मान प्राप्त है। डॉ. जमुआर को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों और मानद उपाधियों से अलंकृत किया जा चुका है। आकाशवाणी पटना तथा दूरदर्शन पर उनकी रचनाओं, वार्ताओं और साक्षात्कारों का प्रसारण उनकी साहित्यिक लोकप्रियता का प्रमाण है। संवेदना, सामाजिक चेतना और सृजनशील ऊर्जा से संपन्न डॉ. पुष्पा जमुआर की लेखनी पाठकों को विचार, प्रेरणा और मानवीय मूल्यों से जोड़ती है। वे साहित्य साधना, नारी सशक्तिकरण और सांस्कृतिक चेतना की प्रेरक प्रतिनिधि हैं।
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