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लिख दे कासिद लिख दे

ग्रामीण आंगन में एक विरहिणी स्त्री दीपक के पास बैठी प्रेम पत्र लिखवा रही है, पास में संदेशवाहक खड़ा है और आसमान में चाँद चमक रहा है।

ममता मंजुला

लिख दे क़ासिद लिख दे इक ख़त,नाम पिया के लिख दे।।
मन की सारी बातें लिख दे,भेद जिया के लिख दे।

सूना-सूना मन का आँगन,सूनी प्रेम नगरिया।
सूने हाथ महावर बिन ये,सूनी पग पैंजनिया।
उनके बिन सब फीके लागें,रँग दुनिया के लिख दे।

मेरे मन की अवधपुरी के,वो राजा मैं रानी।
पावन प्रेम हमारा जैसे,है सरयू का पानी।।
वो बसते साँसों में जैसे,राम सिया के लिख दे।

छूटे खेल सभी सखियों सँग,छूटे घर चौबारे।
उनसे नाता जोड़ा जब से,छूटे बंधन सारे।
नैहर छूटा और गए दिन,अब गुड़िया के लिख दे..

वो हैं चाँद चकोरी मैं हूँ,वो दीपक मैं बाती।
सागर बिन ज्यों नदी अधूरी,गीत नहीं गा पाती।
सागर भी क्या रहे अधूरा,बिन नदिया के लिख दे।


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