सीधा सा गणित

सीधा सा गणित: बहू और ससुर के रिश्ते की भावुक हिंदी कहानी

नीरजा कृष्णा, पटना

पड़ोस की वर्मा आंटी ने आज चार किलो गाय का दूध भेज दिया था।

बहू मीनू जोश से बोली,

“मम्मी जी, दीदी और बच्चों को पनीर के पराँठे बहुत पसंद हैं। अभी इस दूध का थोड़ा पनीर बनाकर बढ़िया नाश्ते का प्रबंध कर लेती हूँ।”

सबकी सहमति पाकर वह कमर कसकर जुट गई। पूरा इंतजाम करके तवा गैस पर रखा ही था… तभी उसका द्विवर्षीय बेटा बबलू बहुत रोने लगा।

मम्मी जी ने कहा, “जाओ बेटा, बबलू को देख लो। तब तक मैं पराँठे सेंकती हूँ।”

खाने की टेबल पर सब खूब तारीफ़ करके नाश्ता कर रहे थे। दीदी का बेटा तो अपनी मामी की प्रशंसा करते नहीं थक रहा था। वह ज़ोर से पुकारकर बोला भी था,

“वाह मीनू मामी वाह! कितने टेस्टी पराँठे हैं। आप भी जल्दी से आओ ना।”

किसी तरह बबलू को सुलाकर वह आई… सब लोग नाश्ता करके उठ चुके थे। उसके हिस्से का पनीर और गूंथा आटा गैस के पास रखा हुआ था। उसकी आँखों में पानी भर आया था।

दीदी धीरे से बोली, “सॉरी मीनू! तुम्हें देर हो रही थी… हम लोग खा लिया। तुम अपने लिए सेंक लो। मम्मी ने सब रख दिया है।”

दूर से सब तमाशा देख रहे महेश बाबू (पापा जी) से नहीं रहा गया। मीनू को प्यार से टेबल पर बैठाकर बोले,

“चल बिटिया, अब तू नाश्ता कर ले। सुबह से लगी हुई है। तेरे लिए गर्मागर्म पराँठे मैं सेंकता हूँ।”

वह सकुचा गई। धीरे से बुदबुदाकर बोली,

“अरे नहीं पापा जी! मैं अपने लिए सेंक लूँगी।”

वह उसको बलपूर्वक बैठाकर बोले,

“अपने आप सेंककर खाने में वह मज़ा नहीं है… जो किसी दूसरे के सेंककर खिलाने से मिलता है… वो भी पनीर के पराँठे। क्यों?”

वह कुछ नहीं बोल पाई… बस अश्रुपूरित नेत्रों से देखती रह गई।

वह उसके इस तरह देखने से विचलित होकर बोले,

“ऐसे क्या देख रही हो? एक बिटिया को मम्मी ने खिलाया… तो दूसरी बिटिया को पापा जी खिला रहे हैं। सीधा सा गणित है ना।”

सब सहमति में ताली बजाने लगे। मीनू अपने आँसुओं को छिपाने का असफल प्रयत्न करने लगी थी।


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