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टेबल पर खुली किताब, बिखरे कागज़ और खिड़की से आती रोशनी, अधूरे सपनों का भावनात्मक दृश्य

ख़्वाब

ख़्वाब” कविता अधूरे सपनों, बिखरी ख्वाहिशों और यादों की गहराई को व्यक्त करती है। यह रचना बताती है कि हर सपना पूरा होना ज़रूरी नहीं, कुछ अधूरे ख़्वाब ही जीने की वजह बन जाते हैं और यादों में हमेशा जिंदा रहते हैं।

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साथ चलो, बस थोड़ी दूर…

साथ चलो, बस थोड़ी दूर। वक्त को हमसफ़र बनाकर जीवन की इस राह पर कदम बढ़ाते चलो। आज नहीं तो कल, कल नहीं तो रोज़—कभी तो साथ चलना होगा। रास्तों के मोड़ पर, थकान के क्षणों में, जब भी मन डगमगाए, तुम्हारा साथ राह को आसान बना देगा। दूरियों के बहाने छोड़ो, भीड़ और शोरगुल में भी एक पल का साथ बहुत है। टूटे हुए ख्वाबों की चुभन और धोखे की चोट भले ही हो, फिर भी जिगर की गहराइयों में छिपा अपनापन पुकारता है—थोड़ी दूर साथ चलो। रीलों के इस दौर में, जहाँ जिस्म की नुमाइश ने अपनापन छीन लिया है, वहाँ सच्चा साथ ही सबसे बड़ी ताकत है। नींद भले ही आँखों से कोसों दूर हो, मगर जागे पलों की तन्हाई में यही ख्वाहिश मन को बार-बार पुकारती है—थोड़ी दूर साथ चलो।

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धूप आती है….

सांझ ढलते ही मन बोझिल हो उठता है। लौटते परिंदों की फुर्ती और घोंसले तक पहुँचने की चाह सिखाती है कि ठिकाना ही असली सुकून है। लेकिन यह सांझ अब न गले लगाती है, न मुस्कान भरती है—बस तन चलता रहता है और मन सूखे पत्तों-सा झरता है। खाने की मेज़ पर अब बर्तनों का कोई राग नहीं, न ही निवालों की कोई चिरौरी। पेट भरना भी बस एक कवायद रह गया है। फिर भी गलियारों से आती धूप पतझड़ से मन को बसंत की ओर ताकने पर मजबूर कर देती है। आँखों से बहता नमकीन पानी चुपचाप तकिए में समा जाता है। सुबह आती है, थकी-हारी, पर वही रोज़मर्रा की भागदौड़ मन को थोड़ी राहत देती है। दिन के उजाले में नए चेहरे और कहानियाँ मिलती हैं, और धीरे-धीरे सांझ से रात तक का मलाल भी उतरने लगता है।

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