अपुन की दादीगीरी

पाँचवीं से छठवीं में कदम रखते ही स्कूल मेरे लिए पढ़ाई से ज़्यादा एक अजीब अनुभव बन गया था। कक्षा में न विद्यार्थी थे, न प्रतिस्पर्धा सिर्फ़ मैं और मेरा वर्चस्व। पिता का अनुशासन, स्कूल में उनका रुतबा और मेरी अकेली उपस्थिति ने मुझे अनजाने ही “दादीगीरी” का ताज पहना दिया। यह दादीगीरी डर से नहीं, परिस्थितियों से उपजी थी. जहाँ सीखने के साथ-साथ प्रभुत्व भी अभ्यास का हिस्सा बन गया।

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“तुम्हारे खतों का पुलिंदा”

तुम्हारे खतों का वह पुलिंदा, जिसे मैंने संदूक में संभाल रखा था, मेरे लिए समय की किताब बन गया है। हर खत अपनी कहानी कहता है कभी देर से उठने की डांट और चाय के ठंडे निशान याद दिलाते हैं, तो कभी तुम्हारी छुटकी की मुस्कान और टीचर की डांट में बचपन की मासूमियत झलकती है। कुछ खत चोट के निशानों, पहली तकरार की मिठास या पहला चुंबन याद दिलाते हैं।

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समय बदला पर मेरी यादों का मेला नहीं

गोगापुर का मेला मेरे लिए केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि बचपन की वह दुनिया है जहाँ उत्साह, जिज्ञासा और अपनापन एक साथ साँस लेते थे। बैलगाड़ी में बैठकर मेले की ओर जाना, दाल-बाटी की खुशबू में भूख से ज़्यादा आनंद महसूस करना और ज़मीन पर बैठकर टूरिंग टॉकीज़ में फ़िल्म देखना ये सब मेरी स्मृतियों का हिस्सा बन गए। आज मेला भले ही बदल गया हो, पर मेरे भीतर वह अब भी वैसे ही जीवित है, जैसे समय ने उसे छुआ ही न हो।

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जब आती थी रामलीला..

महिदपुर रोड पर आयोजित रामलीला में हनुमान जी की झांकी सबसे रोमांचकारी थी. केले और फलों से लदे पेड़ों को छलाँग लगाकर तोड़ते, अशोक वाटिका उजाड़ते, और कभी-कभी फल दर्शकों की ओर उछालते। दर्शक इसे श्रद्धा से हनुमान जी का प्रसाद मान लेते थे।

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कागज़ की कश्ती

कविता बचपन की उन मीठी यादों को जीवंत करती है जब बारिश में “कागज़ की कश्ती” सपनों का प्रतीक बन जाती थी। न चिंता थी, न भय—बस मासूमियत और आनंद था। अब वक्त बदल गया है; बारिश, दोस्त और वो बचपन सब पीछे छूट गए हैं। “कागज़ की कश्ती” आज सिर्फ उन सुनहरे दिनों की प्यारी याद बनकर रह गई है।

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ढूँढें माँ की छाँव

यह कविता गहन भावनाओं और स्मृतियों के माध्यम से माँ और बचपन की छाया की खोज को प्रस्तुत करती है। पहली कविता में माता की ममता और उनके बिना घर की खाली-खाली देहरी की पीड़ा व्यक्त की गई है, जबकि दूसरी कविता में बचपन की नॉस्टैल्जिया और पिता की यादें उजागर हैं। कवि ने मातृत्व, प्रेम और संवेदनशीलता के रसों के साथ भावनाओं की गहराई में जाकर वियोग, याद और आत्मचिंतन का दृश्य खींचा है।

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मासूम सपने

अष्टमी के दिन गिन्नी और सक्षम को खेलने का मौका मिला। गिन्नी की विधवा माँ चाची की मदद में व्यस्त थीं, इसलिए बच्चों को थोड़ी आज़ादी मिली। सक्षम बड़े मासूम अंदाज़ में गिन्नी से पूछता है कि वह रोज उसके साथ क्यों नहीं खेलती। गिन्नी बताती है कि उसे पढ़ाई करनी है, क्योंकि माँ कहती हैं कि लड़कियाँ ज्यादा नहीं पढ़तीं, उन्हें घर के कामों के लिए तैयार रहना चाहिए।

सक्षम चाहता है कि वह भी अपने पापा को ढूँढे और घर वापस लाए, लेकिन गिन्नी उसे समझाती है कि ऊपर आकाश में सब लोग गुम हो जाते हैं। दोनों भाई-बहन अपने छोटे-छोटे सपनों और मासूम बातचीत में उलझे हुए हैं। चाची की चीखती आवाज उन्हें जगाती है, और गिन्नी की आँखों में चमकते सपने कुछ पल में बिखर जाते हैं। यह कहानी बच्चों की मासूमियत और उनके भीतर की संवेदनशीलता को दर्शाती है।

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पुश्तैनी घर के बाहर खड़ी संघर्षशील भारतीय महिला, पारिवारिक बंटवारे के बाद भावुक दृश्य।

तिनके

छिन चुकी थीं एक छत, जो बँटवारे की भेंट चढ़ गई थी और मजबूरी में बेचनी पड़ी थी।
वैसे तो सविता को ज़मीन-जायदाद से कोई मोह नहीं था, लेकिन एक रहने को घर तो चाहिए ही था — जो अपना होता। पर जमीनी लालची अपनों ने ही उसका घर छीन लिया था। कानूनी दांव-पेंच में सविता को अपनी पतंग काटने में बरसों लग गए।
जीवन बिखरे तिनकों को समेटने में बीत रहा था। ख्वाहिशों की आग भी अब मध्यम हो चुकी थी।

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वर्जित इच्छाओं की अपराधिनी…

आज-कललम्बे दिनऔर छोटी रातों मेंकई ख्वाबएक-सी शक्ल लिएआ रहे हैं और दिनबहुत देर सेअलसाई-सी शाम मेंतब्दील हो रहा नहीं-नहींये खूब तेजचुहचुहाती गर्मियों वाले दिन नहीं ये तो बस अभी-अभी आयेवसंत के पीले दिन हैंजो अचानकइस लॉक डाउन मेंप्रौढ़-से हो गए हैं इस बारहोली के सतरंगीदिनों के बादजाने क्यों इतनेबेरंग से हो गए हैंदिन-रात अपने जन्म…

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रामलीला: एक प्रतीक्षा, एक परंपरा, एक अपनापन

साल 1977 की यह रामलीला सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि महिदपुर रोड की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान थी। रंग-बिरंगे पर्दों, अनुशासनपूर्ण व्यवस्था और जीवंत पात्रों वाली यह रामलीला आज भी स्मृतियों में जीवित है, जब लोग दोपहर में ही रात की सीट बुक करने चले जाते थे, और हनुमानजी का प्रसाद पूंछ से मिलता था।

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