माँ तेरा आँचल…
‘माँ तेरा आँचल’ कविता माँ के स्नेह, ममता और सुरक्षा के उस भावलोक को चित्रित करती है जहाँ आँचल ही संसार बन जाता है। यह रचना बचपन की स्मृतियों और मातृत्व की गरिमा को सरल शब्दों में जीवंत कर देती है।

‘माँ तेरा आँचल’ कविता माँ के स्नेह, ममता और सुरक्षा के उस भावलोक को चित्रित करती है जहाँ आँचल ही संसार बन जाता है। यह रचना बचपन की स्मृतियों और मातृत्व की गरिमा को सरल शब्दों में जीवंत कर देती है।
यह कविता बचपन की उन सरल और सच्ची यादों को जीवंत करती है, जब नानी का गाँव, चूल्हे की रोटी, नीम की छाँव, पाठशाला के संस्कार और बिजली जाने पर चिमनी की रोशनी जीवन का हिस्सा थे। “याद आता है पुराना जमाना” सिर्फ स्मृतियों का वर्णन नहीं, बल्कि उस सादगी, अपनापन और संस्कारों की दुनिया की भावनात्मक पुनर्स्मृति है, जो आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में कहीं पीछे छूट गई है।
सिगड़ी की गर्माहट, मैया का स्नेह, ताई जी का अनुशासन और मम्मी की टोका-टाकी संयुक्त परिवार के वे दिन आज भी दिल को छू जाते हैं। यह संस्मरण बचपन, संस्कार और रिश्तों की उस दुनिया में ले जाता है, जहाँ हर सीख स्नेह के साथ मिली।
विजया डालमिया, प्रसिद्ध लेखिका, हैदराबाद बादलों के पार एक जहान और भी है,यादों के दरमियान जो नहीं है, वह भी है.31 दिसंबर 2022 नानी नहीं रही यह मैसेज देखते ही हाथ-पाँव सुन्न हो गए. आँखों में आँसू आए और जम गए. होंठ फड़फड़ाए और खामोश हो गए. हालाँकि जानती थी, समझ भी रही थी, फिर…
महिदपुर रोड और कसारी के पुराने सुनसान रास्तों की पृष्ठभूमि में लिखा यह संस्मरण बचपन के डर, ग्रामीण जीवन और कल्पना की उड़ान को जीवंत करता है। एक सफेद परछाई, भूत का भ्रम और अंत में उसका माइलस्टोन निकलना—कहानी को रोचक और भावनात्मक बना देता है।
सब्ज़ियों की मंडी से शुरू हुई यह स्मृतियों की यात्रा रिश्तों तक पहुँचती है, जहाँ लेखक अतीत और वर्तमान की तुलना करते हुए बताता है कि जैसे सब्ज़ियाँ बासी होकर फेंक दी जाती हैं, वैसे ही आज रिश्ते भी संवेदना के अभाव में डस्टबिन तक पहुँच जाते हैं।
माँ का साथ शब्दों का मोहताज नहीं होता। कभी वह धूप में छाता बन जाती है, तो कभी जीवन की भीड़ में सहारा। उम्र भले ही शरीर पर अपना असर छोड़ दे, पर माँ की मौजूदगी वही सुकून देती है. निःशब्द, निःस्वार्थ और पूरी तरह सुरक्षित। माँ के साथ बिताया हर पल स्मृति बनकर जीवन भर साथ चलता है
एक समय था जब हर यात्रा का सबसे भरोसेमंद साथी “बिस्तरबंद” होता था। उसमें सिर्फ बिस्तर नहीं, बल्कि पूरे परिवार की सहूलियत, बचपन की जिज्ञासाएँ और सफ़र की गर्माहट बंद होती थी। आज भले ही एयरबैग ने उसकी जगह ले ली हो, पर यादों में बिस्तरबंद अब भी ज़िंदा है।
बचपन में आम की गुठलियाँ हमारी खुशियों का साधन थीं। महिदपुर रोड की गलियों में बिखरी गुठलियाँ अंकुरित होकर छोटे पौधे बन जाती थीं। हम उन्हें उखाड़कर घर लाते, पत्थर पर घिसते और फूँक मारकर सुनते “बज रहा है या नहीं।” टूटती गुठली पर डाँट और मार भी सहते, फिर अगले दिन फिर से तलाश में निकल पड़ते। आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, वह सिर्फ़ खेल नहीं था. धैर्य, लगन और छोटे-छोटे प्रयासों की सीख भी थी, जो अब तक दिल में धीरे-धीरे बजती रहती है।
मेरी ज़िंदगी एक जगह से शुरू नहीं हुई।
वह एक किराए के मकान से दूसरे तक भटकती रही। यह घर सिर्फ़ ईंट और सीमेंट से नहीं बना, इसमें हमारे डर, संघर्ष और सपने बसे हैं। इसीलिए यह साधारण-सा घर मेरे लिए बहुत हसीन है।