विदा के उस मोड़ पर खड़ी यादें

विजया डालमिया, प्रसिद्ध लेखिका, हैदराबाद

बादलों के पार एक जहान और भी है,
यादों के दरमियान जो नहीं है, वह भी है.
31 दिसंबर 2022 नानी नहीं रही यह मैसेज देखते ही हाथ-पाँव सुन्न हो गए. आँखों में आँसू आए और जम गए. होंठ फड़फड़ाए और खामोश हो गए. हालाँकि जानती थी, समझ भी रही थी, फिर भी दिल को समझाना अक्सर कठिन होता है और यहीं हम हार जाते हैं. उस रोज़ भी यही हुआ. मम्मी से हमेशा कहती थी-मम्मी, जब नानी नहीं रहेगी तो मैं वहाँ नहीं जाऊँगी. और मम्मी कहती-ऐसा थोड़ी होता है.
मैं फिर कहती… बिना नानी के नानी का घर कैसा? नानी से ही तो नानी का घर है.और मम्मी कुछ नहीं कहती.
पर मम्मी ही पहले चली गई.
नानी थी जब तक लगता रहा..मेरी मम्मी की मम्मी तो है, जो हमें मम्मी से भी ज़्यादा प्यार करती है.पर अब कोई नहीं. आज नानी की बिखरी यादों से मुलाक़ात करने जा रही हूँ. प्लेन में बैठते ही आँखें बंद कर लीं, ताकि यादों को क़ैद कर लूँ. यूँ तो बंद होने पर हर चीज़ क़ैद हो जाती है, पर यादें आँखें बंद करते ही आँसुओं के रूप में बह निकलीं
अरे, बिजली के कर रही तू?..बिजली नानी का दिया नाम. प्यार या गुस्सा ज़्यादा आने पर मुझे वह इसी नाम से बुलाती थी.
जब किसी काम के लिए मैं कहती मेरा मूड नहीं है. तो आग लगे थारा मुंड न.. कहकर गुस्साने लगती.असल में तो वह हमें समझा रही होती थी, पर हमारी समझ उसे गुस्सा ही समझती. अचार के लिए कटी कैरियों को लेकर छत पर भाग जाना.
ताला भीतर कमरा जिसमें नानी की सारी चीज़ें छुपाकर रखी होती थीं. क्या ख़ूब नाम था ताला भीतर कमरा. आज भला ऐसे नाम कहीं सुन पाते हैं हम?अनाज फटकती, बिलोना करती, सब्ज़ियाँ सुधारती नानी. आने-जाने वालों से बतियाती हुई नानी. नानाजी की छेड़छाड़ का जवाब झूठ-मूठ के गुस्से से देती नानी. चूल्हे पर मुस्तैदी से बड़ी-बड़ी गोल-गोल रोटियाँ बनाती नानी. मंदिर में हाँफते-हाँफते भगवान की आरती गाती नानी. भजन सुनाने और गीता का पाठ सुनाने की ज़िद करती नानी. ख़ालिस दूध वाली चाय में तुलसी डालकर हमें अपनी चाय देती नानी. दोपहर के सन्नाटे में भी जागती रहती नानी. सोते हुए जागते रहना और जागते हुए सोना..हमने नानी से ही सीखा. अपने हाथ में ख़ुद से मेहंदी लगा..यह कह-कहकर मेहंदी में मुझे दक्षता दिला दी. इतनी कि प्राइस भी मिला और जजमेंट के लिए भी मेरा नाम चुना गया.
ऐसी थी नानी…
ना किसी को दम लेने देती, ना ख़ुद दम लेती.जब तक काम ना हो जाए, दम-दम कर देती थी.पल में गुस्सा, पल में प्यारऔर दोनों ही सच्चे.ना बातों में बनावट, ना किसी चीज़ में मिलावट.आज उनकी यादें हर तऱफ से मुझे घेरे हुए हैं.उनके जाने के बाद वहाँ जा रही हूँ, जहाँ वो नहीं हैं. उनकी आत्मा हमेशा गोल बाज़ार में बसती रही.
हमारी यादें भी तो वहीं से जुड़ी हैं. मैं सोचती रहती हूँ..घर तो नानाजी ने बनाया, लेकिन हम हमेशा नानी का घर ही कहते थे. तांगे में बैठकर नानी के घर पहुँचना अपने आप में मज़ेदार होता था. सारे रास्ते तांगे की आवाज़ सुनना और जीभ से वही आवाज़ निकालने की कोशिश करना.हम अक्सर गर्मियों में जाते थे. शाम के वक़्त पहुँचतेउस समय सात बजे तक क़ाफी उजाला रहता था. ऊपर बालकनी से तांगे की आवाज़ सुनकर नानी झाँकती हुई नज़र आ जाती थी.सीढ़ी से भागकर उतरते मौसी और मामीजी के बच्चे.
नीचे दुकान जिसे हम गद्दी कहते थे .वहाँ बैठे मुनीमजी और मामाजी. सबके चेहरे खिले-खिले. सबसे मिलकर ऊपर जाते, तब तक नानी सीढ़ियों के पास की खिड़की में खड़ी-खड़ी हमें देखती रहती. ख़ुशी से झूठ-मूठ का गुस्सा दिखाती और अपने से लिपटा लेती. आज टैक्सी में बैठकर नज़र घुमाई तो धुँधली आँखों से कुछ भी स़ाफ नज़र नहीं आया. मैं उन रास्तों को तलाश रही थी, जहाँ से कभी मैं गुज़री थी.जहाँ बचपन बीता, जवानी के दिन भी ख़ूबसूरत यादों के साथ बीते. पर आज रास्ते मुझे पहचानने में लगे थे, और मैं उन्हें तलाश रही थी. इसी कशमकश में मैंने तांगे से टैक्सी तक का स़फर भीगी आँखों से तय किया..और चल पड़ी उस जगह, जहाँ नानी अब ज़िंदगी से मुक्त होकर ़फोटो में मुस्कुरा रही थी..सबको आशीर्वाद देते हुए.शायद एक शिकायत के साथ अब क्यों आए? पहले आते तो गले लगाती.. उनकी आँखों में एक अनकहा दर्द और अपने दिल में एक कभी न ख़त्म होने वाला पछतावा महसूस किया.
तभी मामीजी की आवाज़ आई…ऐसा कभी मत सोचना, नानी नहीं रही तो नानी का घर भी नहीं रहा…और मैं उनके गले लगकर फूट-फूटकर रो पड़ी.

3 thoughts on “विदा के उस मोड़ पर खड़ी यादें

  1. यादों की मनभावन दुनिया, कुछ पल के लिए ही सही, कठोर यथार्थ से अलग दुनिया में ले जाती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *